शनिवार, 24 अगस्त 2013

सपा कहीं ''बीजेपी'' के लिए रास्ता तो नहीं तैयार कर रही है ;


  • सपा कहीं ''बीजेपी'' के लिए रास्ता तो नहीं तैयार कर रही है ;
    जिसपर चलकर ये कांग्रेस की मदद करना चाहते हों ;
    भाजपा की साम्प्रदायिक छवि तैयार करने के चक्कर में सपा कहीं अपने लिए बड़े खतरे न खड़े कर ले, वैसे भी यह पार्टी जिन लोगों के चंगुल में फास चुकी है वो अधिकाँश लोग उसी भाजपा और कांग्रेस की लाइन के सोच के ही लोग हैं.
    अखिलेश यादव के जिस युवा चरित्र और नए उर्जावान चहरे को लोगों ने देखने का भ्रम पाला था वह नक्कारखाने में टूटी हुयी आवाज़ के रूप में ही सामने आ रहा है, यदि भाजपा का अंतर्कलह उसे गच्चा नहीं दिया तो सपा अनचाहे इतना उलटा करेगी जो इन संघियों के बहुत काम आयेगा.
    भाजपा/कांग्रेस के जो लोग सपा के गर्भगृह में बैठे हैं उसका मूल कारण यह है की सपा कभी अपने इमानदार कैडर बनाती ही नहीं है, कहीं से वोट के हिसाब से महाभ्रष्ट, जातिवादी, साम्प्रदायिक तत्वों को अपने इर्दगिर्द रखती है जिससे इसकी नीतियाँ ही इसके खिलाफ जाती हैं.
    रहा है. मिशन २०१४ के चलते प्रदेश में केवल २०१४ के लोकसभा के चुनाव की तैयारियां चल रही हैं, प्रदेश का मुख्यमंत्री देश के प्रधानमंत्री बनाये जाने के सपा प्रमुख के लिए वोट के इंतजामात में 'अनाप सनाप फैसले' ले रहा है 'आरक्षण' की लम्बी लड़ाई का खात्मा कर रहा है, तुष
    इस बार की सरकार जिस तरह, जिन कारणों से बनी है कौन नहीं जानता. ऐसे सुयोग्य अवसर को छोड़कर ये उन्ही हालातों में पहुँच गए हैं जहां से जनता किसी भी सरकार को बाहर कर देती है. प्रदेश अनेक संकटों से जल रहा है चरों तरफ हाहाकार मचा हुआ है पर इन्हें नज़र ही नहीं
    आकरण के तमाम फैसले ले रहा है, अपनों और परायों के बीच का अंतर भूल गया है, यही साड़ी बातें हैं जो अंदर तक नुक्सान पहुंचाती/करती हैं.
    जिस कांग्रेस के इशारों पर सपा बसपा ,'थिरक' रही हैं राजनितिक विश्लेषक उस मर्म को समझते हैं और अब वे यह भी जान गए हैं की ये देश की सत्ता के विकल्प नहीं है बल्कि कांग्रेस के सहयोगी ही हैं. यह आश्चर्य देश की अवाम जिसे दलित और पिछड़े के रूप में पहचाना जाता है कब समझेगा.
    ना अब उतना आसान नहीं है क्योंकि ये आधुनिकता ही उस पुरातन सोच के समापन के लिए आयात की गयी है जिसमें समाजवाद के सारे सपने डुबोये जा चुके हैं सामाजिक न्याय की अवधारणा के मायने बदल दिए गए हैं तभी तो दलित और पिछड़े के पार्टी रूप में पहचान रखने वाली पार्टियाँ उनके हक और हकुकों के लिए काम कर रही हैं जो सदियों से सब कुछ कब्जियाये हुए हैं. मुझे लगता है जिस अस्मिता की रक्षा के लिए मुल
    यही कारण है की नरेन्द्र के राष्ट्रवाद से कांग्रेस कत्तई भयभीत नहीं है, इसलिए भी की जिस हिंदुत्व का बुखार भाजपाई चढ़ाना चाहते हैं उसी हिन्दू में देश की 85 फीसदी अवाम दलित और पिछड़े के रूप में मौजूद हैं जिसे ये अलमबरदार अपने अपने खांचे में जातियों के हिसाब से बाटेंगे.जिसका असर यह होगा की 'मोदी' का उभार भी दब जाएगा और दलित और पिछड़े के रूप में बड़े समुदाय का भी हिसाब हो जाएगा.
    आधुनिक भारत को सम
    झयम सिंह ने सारी बदनामी ली उसी मस्जिद को नरसिंघा राव की कांग्रेस सरकार ने ध्वस्त करा दिया था. वो काम भी इन दोनों ने भाजपा के लिए ही किया था वैसे ही आज के आसार नज़र आ रहे हैं.
    आखिर विकल्प क्या है ;
    विकल्प है ;
    इसपर चले कौन जिस समय लालू ने अडवानी के रथ को रोका था उस समय की रोक और आज की इस रोक में अंतर ये है की तब अवाम को मंडल का भुत सवार था और अडवानी कमंडल के बहाने मंडल का विरोध कर रहे थे, इस बात को लालू समझा पाने में कामयाब हुए थे. पर अब सरकार इस धार्मिक पाखण्ड को कैसे पहचानेगी, क्या नाम देगी इसे अपने हक़ में कैसे करेगी सब सवाल उसके पाले में ही है. (उत्तर तो इसके हैं पर देखना है सरकार क्या करती है.)
    आखिर विकल्प क्या है ? विकल्प है! प
    -डॉ.लाल रत्नाकर
  • Omprakash Kashyap
    नमस्कार. आपने एक ज्वलंत समस्या की ओर संकेत किया है. इसमें कोई संदेह नहीं कि समाजवादी पार्टी, साथ में दूसरी पार्टियां भी केवल लोकप्रिय राजनीति को ध्यान में रखकर निर्णय ले रही हैं. लोकप्रिय राजनीति की यह विवशता भी है. पर समस्या का दूसरा पहलू भी है. और वह है बौद्धिक नेतृत्व की कमी. समाजवादी पार्टी का गठन एक विचारधारा के आधार पर किया गया था. या यूं कहें कि मुलायम लोहिया से नाम पर अपनी राजनीतिक मत्त्वाकांक्षाओं को साधना चाहते थे. आज पूंजीवाद के आलोचक हो हजारों हैं, जिसको देखो वही इसे कोसने लगता है, किंतु उसके विकल्प पर बात करने वाले या उसकी खोज के लिए समर्पित विद्वान बहुत कम हैं. इसलिए समाजवाद आज गया—बीता और थका हुआ विचार लगता है. मुलायम जानते हैं कि समाजवाद का नारा उन्हें ज्यादा दूर नहीं ले जा सकता. इसलिए पिछले चुनावों में वे अंबानी के करीब आ गए थे. ऐसे में उनके लिए तुष्टीकरण की राजनीति ही बचती है. यात्रा पर प्रतिबंध लगाने से उन्हें लगता है कि इससे मुस्लिम गोलबंध होंगे. इसलिए को आगे किया गया है. यह मुलायम या कहो कि लोकप्रिय राजनीति की विवशता है.
    समस्या का एक और पहलू भी है. समाजवादी पार्टी की तरह भाजपा भी विचारधारा आधारित पार्टी है. उग्र राष्ट्रवाद और सांप्रदायिकता के बहाने वह दक्षिणपंथी ताकतों को सत्ता में लाना चाहती है. इसके लिए उसको संघ, विश्व हिंदू परिषद आदि संस्थाओं का बौद्धिक नेतृत्व प्राप्त होता है. भाजपा जानती है कि इन संस्थाओं के आधार पर देश का बड़ा वर्ग गोलबंद हो सकता है. इसलिए इनके निर्देश को मानना उसकी मजबूरी बनी रहती है. विडंबना है कि आजादी के सातवें दशक में भी, संख्या में बहुसंख्यक वर्ग होने के बावजूद पिछड़ों के भीतर से बौद्धिक नेतृत्व नहीं उभर पाया है, जो पिछड़ा राजनीति का बौद्धिक नेतृत्व कर सके. आंबेडकर के नाम पर दलित एकजुट हुए और लंबे संघर्ष के बाद उनके भीतर एक बौद्धिक नेतृत्व विकसित किया. जो दलितों के हितों पर आंच आते ही सक्रिय हो उठता है. मीडिया के वर्णवादी सोच और अघोषित प्रतिबंधों के बावजूद ऐसे अवसर पर अखबार लेख और प्रतिक्रियाओं से भर जाते हैं.
    के बावजूद तत्संबंधी फैसलों पर अमल नहीं करा पाते. हम सब अच्छे आलोचक हैं. इस कर्म में ईमानदार भी हैं, लेकिन अच्छे परामर्शक नहीं है. इसका एक कारण हम सबकी मानसिकता पर अभिजन संस्कृति का असर भी है. सदियों से शासित होते आए हैं, इसलिए शासन की राह निकालना, उसको सुरक्षित रहता, शासकों को उन्हीं के मोर्चे पर मात देना हमें नहीं आता. हमारी यह कमजोरी मुलायम सिंह जैसे पिछड़ी राजनीति करने वाले नेताओं की भी कमजोरी है. आज पिछड़ों में मध्यवर्ग की संख्या काफी है. यदि पिछड़ा वर्ग का बौद्धिक मानस बन सके, और वह अपने वर्ग से निरंतर संवाद करे तो इस देश में बदलाव की एक राह निकल सकती है, वरना मजबूरी हो या स्वार्थवश मुलायम और मायावती जैसे नेता समाज के शीर्षस्थ वर्ग के नेताओं के इशारे/कूटनीति पर खेलते ही रहेंगे.
    पिछड़ा राजनीति के साथ ऐसा नहीं है. यदि होता तो मीडिया के उस खेल का तार्किक पर्दाफाश कर पाता जो बार—बार यह कहकर उकसाता रहता है कि मायावती और मुलायम मिल ही नहीं सकते. दलित और पिछड़ों ने शताब्दियों से जातीय उत्पीड़न का दंश सहा है. दोनों की त्रासदियां लगभग एक जैसी हैं. इसलिए वे एक—दूसरे के स्वाभाविक सहयोगी बन सकते हैं. समाज से वर्णवादी सोच का खात्मा करने, उसके समर्थकों को धूल चटाने के लिए उन्हें बनना भी चाहिए. जो मीडिया यह कहता है कि राजनीति में कोई स्थायी मित्र या शत्रु नहीं होता, वही मायावती और मुलायम के पुराने झगड़ों की याद दिलाकर उनके बीच दूरी बनाए रखता है. इसलिए मायावती वर्णवादी ब्राह्मणों की शरण में चली जाती है, मुलायम ठाकुरों की लल्लो—चप्पो में लगे रहते हैं लेकिन,ये दोनों ही, अपने स्वाभाविक सहयोगियों के करीब आने से बचते हैं. इसलिए मायावती के सक्रिय राजनीत में रहते दलितों के आरक्षण पर आंच आती है, मुलायम सूबे में सरकार हो
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शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

देश में गृहयुद्ध का खतरा, परिवर्तन जरूरी: राजनाथ

लखनऊ/ब्यूरो/इंटरनेट डेस्क | अंतिम अपडेट 23 अगस्त 2013 11:48 PM IST पर
rajnath spoke agains fdiभाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा कि केंद्र में भाजपा सरकार बनी तो खुदरा कारोबार में एफडीआई को इजाजत नहीं दी जाएगी।
व्यापारियों की समस्याओं के समाधान के लिए राष्ट्रीय स्तर पर ‘व्यापारी आयोग’ गठित किया जाएगा। किसान क्रेडिट कार्ड की तर्ज पर छोटे व मध्यम वर्ग के व्यापारियों को आर्थिक मदद को ‘व्यापारी क्रेडिट कार्ड’ मुहैया कराने की योजना शुरू की जाएगी। पेंशन भी देंगे।
वह शुक्रवार को यहां रवींद्रालय में भाजपा के व्यापार प्रकोष्ठ की तरफ से आयोजित व्यापारी सम्मेलन में बोल रहे थे। सिंह ने कहा कि केंद्र सरकार आर्थिक मोर्चे पर बुरी तरह फेल हो गई है।
महंगाई पर काबू लगाना और रुपये की कीमत संभालना उसके वश का नहीं रहा। देश में गृहयुद्ध का खतरा बढ़ता जा रहा है। देश के सम्मान व स्वाभिमान को बचाने के लिए भाजपा को सत्ता में लाना होगा।
सिंह ने व्यापारियों, किसानों और अन्य सभी लोगों से लोकसभा चुनाव में भाजपा के पक्ष में ज्यादा से ज्यादा मतदान करने का आह्वान किया।
अटल तो अर्थशास्त्री नहीं थे
राजनाथ ने कहा कि अटल विहारी वाजपेयी अर्थशास्त्री नहीं थे लेकिन उन्होंने न सिर्फ महंगाई पर काबू पाने में सफलता पाई थी बल्कि रुपये की कीमत को भी संभाला था।
पर आज एक अर्थशास्त्री देश का प्रधानमंत्री है लेकिन न महंगाई रुक रही है और न रुपये की कीमत में गिरावट। केंद्र की मौजूदा सरकार देश के लगभग पांच करोड़ खुदरा कारोबारियों की किस्मत को विदेशियों के हाथों सौंपने पर आमादा है।
कहा कि विदेशी पूंजीनिवेश के बगैर भी देश की अर्थव्यवस्था बदल सकती है। उन्होंने कहा, बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में विदेशी निवेश पर भाजपा को कोई आपत्ति नहीं है लेकिन खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश स्वीकार करने का मतलब देश की अर्थव्यवस्था की डोर विदेश को सौंप देना है।
सपा-बसपा कब से हो गईं व्यापारी हितैषी
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष सिंह ने कहा कि सपा और बसपा व्यापारियों की हितैषी नहीं हैं। एक समय सपा के लोग कहते थे कि सरकार में आए तो वैट नहीं लागू होने देंगे।
लेकिन सत्ता में आने पर वादा भूल गए। कहा, सपा व बसपा अगर व्यापारियों के हितैषी हैं तो व्यापारियों के हितों पर चोट करने वाली कांग्रेस सरकार से समर्थन वापस लें।
यही है भाजपा का चरित्र और चेहरा ;जिसे शायद सपा समझ नहीं रही है .
सपा कहीं ''बीजेपी'' के लिए रास्ता तो नहीं तैयार कर रही है ;
जिसपर चलकर ये कांग्रेस की मदद करना चाहते हों ;

भाजपा की साम्प्रदायिक छवि तैयार करने के चक्कर में सपा कहीं अपने लिए बड़े खतरे न खड़े कर ले, वैसे भी यह पार्टी जिन लोगों के चंगुल में फास चुकी है वो अधिकाँश लोग उसी भाजपा और कांग्रेस की लाइन के सोच के ही लोग हैं.
अखिलेश यादव के जिस युवा चरित्र और नए उर्जावान चहरे को लोगों ने देखने का भ्रम पाला था वह नक्कारखाने में टूटी हुयी आवाज़ के रूप में ही सामने आ रहा है, यदि भाजपा का अंतर्कलह उसे गच्चा नहीं दिया तो सपा अनचाहे इतना उलटा करेगी जो इन संघियों के बहुत काम आयेगा.
भाजपा/कांग्रेस के जो लोग सपा के गर्भगृह में बैठे हैं उसका मूल कारण यह है की सपा कभी अपने इमानदार कैडर बनाती ही नहीं है, कहीं से वोट के हिसाब से महाभ्रष्ट, जातिवादी, साम्प्रदायिक तत्वों को अपने इर्दगिर्द रखती है जिससे इसकी नीतियाँ ही इसके खिलाफ जाती हैं.
इस बार की सरकार जिस तरह, जिन कारणों से बनी है कौन नहीं जानता. ऐसे सुयोग्य अवसर को छोड़कर ये उन्ही हालातों में पहुँच गए हैं जहां से जनता किसी भी सरकार को बाहर कर देती है. प्रदेश अनेक संकटों से जल रहा है चरों तरफ हाहाकार मचा हुआ है पर इन्हें नज़र ही नहीं आ रहा है.
मिशन २०१४ के चलते प्रदेश में केवल २०१४ के लोकसभा के चुनाव की तैयारियां चल रही हैं, प्रदेश का मुख्यमंत्री देश के प्रधानमंत्री बनाये जाने के सपा प्रमुख के लिए वोट के इंतजामात में 'अनाप सनाप फैसले' ले रहा है 'आरक्षण' की लम्बी लड़ाई का खात्मा कर रहा है, तुष्टिकरण के तमाम फैसले ले रहा है, अपनों और परायों के बीच का अंतर भूल गया है, यही साड़ी बातें हैं जो अंदर तक नुक्सान पहुंचाती/करती हैं.
जिस कांग्रेस के इशारों पर सपा बसपा ,'थिरक' रही हैं राजनितिक विश्लेषक उस मर्म को समझते हैं और अब वे यह भी जान गए हैं की ये देश की सत्ता के विकल्प नहीं है बल्कि कांग्रेस के सहयोगी ही हैं. यह आश्चर्य देश की अवाम जिसे दलित और पिछड़े के रूप में पहचाना जाता है कब समझेगा.
यही कारण है की नरेन्द्र के राष्ट्रवाद से कांग्रेस कत्तई भयभीत नहीं है, इसलिए भी की जिस हिंदुत्व का बुखार भाजपाई चढ़ाना चाहते हैं उसी हिन्दू में देश की 85 फीसदी अवाम दलित और पिछड़े के रूप में मौजूद हैं जिसे ये अलमबरदार अपने अपने खांचे में जातियों के हिसाब से बाटेंगे.जिसका असर यह होगा की 'मोदी' का उभार भी दब जाएगा और दलित और पिछड़े के रूप में बड़े समुदाय का भी हिसाब हो जाएगा.
आधुनिक भारत को समझना अब उतना आसान नहीं है क्योंकि ये आधुनिकता ही उस पुरातन सोच के समापन के लिए आयात की गयी है जिसमें समाजवाद के सारे सपने डुबोये जा चुके हैं सामाजिक न्याय की अवधारणा के मायने बदल दिए गए हैं तभी तो दलित और पिछड़े के पार्टी रूप में पहचान रखने वाली पार्टियाँ उनके हक और हकुकों के लिए काम कर रही हैं जो सदियों से सब कुछ कब्जियाये हुए हैं.
मुझे लगता है जिस अस्मिता की रक्षा के लिए मुलायम सिंह ने सारी बदनामी ली उसी मस्जिद को नरसिंघा राव की कांग्रेस सरकार ने ध्वस्त करा दिया था. वो काम भी इन दोनों ने भाजपा के लिए ही किया था वैसे ही आज के आसार नज़र आ रहे हैं.
आखिर विकल्प क्या है ;
विकल्प है ; 
आखिर विकल्प क्या है ? विकल्प है ! पर इसपर चले कौन जिस समय लालू ने अडवानी के रथ को रोका था उस समय की रोक और आज की इस रोक में अंतर ये है की तब अवाम को मंडल का भूत सवार था और अडवानी कमंडल के बहाने मंडल का विरोध कर रहे थे, इस बात को लालू समझा पाने में कामयाब हुए थे. पर अब सरकार इस धार्मिक पाखण्ड को कैसे पहचानेगी, क्या नाम देगी इसे अपने हक़ में कैसे करेगी सब सवाल उसके पाले में ही है. (उत्तर तो इसके हैं पर देखना है सरकार क्या करती है.)
-डॉ.लाल रत्नाकर

बुधवार, 10 जुलाई 2013

भारत की न्यायपालिका

भारतीय न्यायपालिका पर कुछ भी बोलना 'अपराध' तो नहीं मान लिया जाएगा .
पर अब ये साफ़ होता जा रहा है की प्रधानमंत्री बनाने के लिए निरपराध व्यक्ति की तलाश होगी. पर यदि ये दोनों एक साथ नहीं आये तो जो हो रहा है वही होत्ता रहेगा और इनकी आगे की ताकतें इतनी कमजोर हो जायेंगी जो इतिहास की सबसे बड़ी कमजोरी होगी .
-कम से कम ये बात आयी तो 

टूट सकते हैं माया और मुलायम के पीएम बनने के सपने

लखनऊ/ब्यूरो | अंतिम अपडेट 11 जुलाई 2013 1:30 AM IST पर

maya and mulayam pm dream
सुप्रीम कोर्ट के नए फैसले से दिल्ली की गद्दी पर बैठने के मायावती और मुलायम सिंह यादव के सपने भी टूट सकते हैं।
दरअसल आय से अधिक संपत्ति के मामले में एक मई 2013 को मायावती को सुप्रीम कोर्ट से करारा झटका लगा। कोर्ट ने कहा कि सीबीआई चाहे तो मामले की जांच करा सकती है।
पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सीबीआई को जांच करने की पूरी आजादी है। उधर लोकसभा सांसद और सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव और उनके बेटे विधायक और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पर भी कोर्ट के फैसले की तलवार लटकी है।
मुलायम सिंह ने केस रद्द कराने की भरपूर कोशिश की लेकिन सफलता नहीं मिली। वो सुप्रीम कोर्ट तक गए लेकिन 13 दिसंबर 2012 को कोर्ट ने सीबीआई को जांच जारी रखने का निर्देश दे दिया।
विधायक मुख्तार अंसारी भी इसकी जद में आ सकते हैं। उन पर हत्या, अपहरण, फिरौती समेत कई आपराधिक मामले हैं। अगर मुख्तार अंसारी को एक भी केस में सजा मिली तो उनकी विधायकी चली जाएगी।

शनिवार, 6 जुलाई 2013

हम एक नया दल बनाने चल रहे हैं।

हम एक नया दल बनाने चल रहे हैं। जिसमें सबकुछ होगा पर इससे यानी इसके लिए जनता से आग्रह है की वह आश्वस्त करे की वह इस दल को समर्थन करेगी।
और यदि समर्थन का वादा करती है तो शहरों और गाँव का भेद मिटाकर एकरूपता लाई जायेगी हर इन्शान को इन्शान समझा जाएगा, गैर बराबरी, अशिक्षा, गरीबी का नामों निशान नहीं होगा, सब की क्षमता के अनुरूप उसे अवसर मिलेगा।
और भी बहुत साड़ी उद्घोश्नाएं आणि हैं इंतज़ार करना होगा।
इस बात का ध्यान रखना होगा की हमें भूख और बेरोजगारी के कृतिम तरीकों से असली आज़ादी से रोका जा रहा है, यह काम् दलित और पिछड़ों का बड़ा समूह पूरा कर सकता है, यह साफ़ है की यदि यह समुदाय एकसाथ खड़ा होगा तो मुस्लिम भी इनके साथ आयेगा।
वक़्त कभी लम्बे समय तक इंतजार नहीं करता और यदि हम खड़े नहीं हुए तो वो हमसे बहुत दूर जा चुका होगा , अतः हमें खड़ा होना होगा लोकतंत्र में एक दिन की भूल,लालच,अदूरदर्शिता, सदियों से इन कौमों को जलालत की जिंदगी जीने को बाध्य की हुयी है यदि इनसे बचना है तो हमें उनके दिए जा रहे लालच और भुलावे से बचना होगा और अपना एक बड़ा और राष्ट्रिय आदोलन ही नहीं खड़ा करना होगा, राष्ट्र की मुख्य धारा में आना होगा।
(जारी) 

गुरुवार, 27 जून 2013

सामाजिक बदलाव का यह रूप

प्रदेश में ब्राह्माणों-दलितों का सबसे ज्यादा उत्पीड़न
 बसपा का ब्राह्माण समाज कार्यकर्त्ता सम्मेलन
जागरण संवाद केंद्र,गाजियाबाद
बहुजन समाज पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव व राज्यसभा सदस्य सतीश चंद्र मिश्र ने कहा कि सपा शासन में तेजी से अपराधों का ग्राफ बढ़ रहा है। हर वर्ग परेशान है, खास तौर से ब्राह्माणों एवं दलितों का सर्वाधिक उत्पीड़न हो रहा है। सपा के डेढ़ वर्ष के कुशासन में पांच हजार से अधिक हत्याएं, साढ़े नौ हजार से अधिक दुष्कर्म, लूट एवं डकैती की घटनाएं हो चुकी हैं।
वह सोमवार को पार्टी द्वारा घंटाघर रामलीला मैदान में आयोजित ब्राह्माण कार्यकर्ता सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि प्रदेश में ब्राह्माणों को सबसे अधिक सम्मान बसपा में मिला है। 2002 में जिस समय उन्हें मायावती ने प्रदेश का महाधिवक्ता बनाया था, उस दौरान उन्होंने वायदा किया था कि पार्टी हमेशा ब्राह्माणों का सम्मान करेगी। वायदे के अनुरूप मायावती ने अपने शासन में 30 से अधिक ब्राह्माणों को महत्वपूर्ण पद दिए। आज भी ब्राह्माणों को सबसे अधिक सम्मान बसपा में ही मिलता है। इस अवसर पर उन्होंने भाजपा पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि भाजपा ने ब्राह्माणों को सिर्फ वोट बैंक के रूप में ही प्रयोग किया।
सम्मेलन में उन्होंने कहा कि प्रदेश में ब्राह्माणों की संख्या 16 फीसद है, लेकिन अभी तक यह समाज बिखरा है। अब जरूरत है तो एकजुट होकर अपनी ताकत का अहसास कराने का। उन्होंने बताया कि 4 मई से शुरू हुए ब्राह्माण सम्मेलन का यह 25 वां सम्मेलन है। अभी दस सम्मेलन बाकी हैं। उन्होंने बगैर नाम लिए भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पर हमला करते हुए कहा कि एक बार वह जहां से जीतते है अगला चुनाव वहां से नहीं लड़ते हैं।
इस अवसर पर प्रदेश के पूर्व उर्जा मंत्री रामवीर उपाध्याय ने अपने छोटे भाई व गाजियाबाद से बसपा के लोकसभा प्रत्याशी मुकुल उपाध्याय को चुनाव जीताने की अपील की। मुकुल उपाध्याय ने कहा कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने चुनाव के दौरान बड़े-बड़े विकास के वायदे किए थे, लेकिन वायदे तो दूर जनता का उनसे मिलना भी असंभव है।
इस अवसर पर सांसद ब्रजेश पाठक, विधायक सुरेश बंसल, अमरपाल शर्मा, वहाब चौधरी एवं जाकिर अली के अलावा जिला अध्यक्ष रामप्रसाद प्रधान, सुबोध पाराशर, डा.अविनाश शर्मा, धनी राम, गोरे लाल जाटव, विनोद हरित, मुकेश जाटव, विनोद मिश्र, मुकेश त्यागी, महेश शर्मा, अशोक शर्मा, विनोद शर्मा सहित अन्य लोग उपस्थित थे।
......................................................................
(प्रासंगिक विश्लेषण)
अवसरवाद का अजीबो गरीब तरीका
लम्बे समय के ब्राह्मणों के स्वार्थ और संग्रहण के स्वाभाव से जब ब्राह्मणों को लोग पहचान गए की ये कितने अवसरवादी और चतुर हैं तो लम्बे समय से इनके साथ रह रहा दलित समुदाय ने भी  इसका विरोध किया। और इनकी स्वाभाविक फासीवादी कांग्रेस पार्टी आसमान से फर्श पर आ गयी दलितों के अपने संगठन ने यह दिखा दिया की अब हम तुम्हारे भरोसे नहीं हैं हम अपनी सरकार बना सकते हैं, अपने समीकरण के साथ जा सकते हैं और शुरुआत भी की इन्होने कांशीराम के प्रयासों से सपा और बसपा ने मिलकर चुनाव लड़े उ प्र में 1993 में और इनकी सरकार भी बनी पर इन्हें चैन कहाँ, इन्होने अंडे नहीं इकटठे किये इन्हें तो लगा की मुर्गी के पेट ही फाड़ डालो और वाही किया इन्होने जिससे जो होना था हुआ और अब ये लगते तो राजनितिक लेकिन ये अब राजनीतिग्य नहिं रहे। वही हुआ मारपीट और सत्ता की हिस्सेदारी में बट गए पहले भाजपा वालों ने बहनजी को डोरे डाले सत्ता में साझी किया बात वहां नहीं बनी मामला अलग थलग पड गया। फिर कांग्रेसियों ने मोल भाव किया बात नहीं बनी। फिर मिले ये वकील साहब सतीश मिश्र, सतीश मिश्र जी बड़े अधिवक्ता हो सकते हैं पर कांग्रेस में नहीं, भाजपा में नहीं, केवल बसपा में क्योंकि वहां उनके आका बैठे हैं, यहाँ इनको पूरी लूट की छूट जो है . खूब लूटा प्रदेश को सारा दोष गया बहिन जी के माथे भला हो बाबा साहब के बनाये कानून को कि ये तो सारे पकड़ में आ रहे हैं, नहीं तो इनकी चलती तो मनुस्मृति में एक क्लाज और जोड़ लेते की 'ब्राह्मण अपराधी के रूप में नहीं पकड़ा जाएगा' और उसका अपराध से कोई रोकेगा तो उसे जेल जाना होगा।
ब्राह्मण सम्मेलनों से संभवतः यही सन्देश दे रहे हैं की एकबार इनके साथ आ जाओ फिर आगे किसी के साथ जाने की जरूरत नहीं होगी. ऐसा कानून बनाएंगे की हमारा कोई कुछ विगाड नहीं पायेगा. यही कारण है की सपा भी परेशान है इन ब्राह्मणों को लेने के लिए की कहीं सारे दलित दल में न चले जाएँ, फिर इनके यहाँ हवन पूजन कौन करेगा.
इन दलों का सारा समय इनके आव भगत में ही बीतता नज़र आ रहा है और काम ही नहीं रहा इनके पास जिसे ये सोच विचार से कर सकें, बहन जी से इन्होने लखनऊ में जिस तरह के ब्राह्मण विहार (बौद्ध के नाम पर बनवा रखे हैं) उसका उपयोग तो कालांतर में यही करेंगे क्योंकि महानगरों में कितने दलित और पिछड़े रहते है.

रविवार, 23 जून 2013

ये सरकारें जो कुछ कर रही हैं क्या केवल वोट के लिए ?

पहले की तरह अब सरकारें ओ काम नहीं कर रही है जिसके लिए विभिन्न पद सृजित किये गए थे, अब उन्हें उन लोगों से भरा जा रहा है जिन्हें उसका मतलब ही नहीं पता है, संगीत, ललित कला, लोक कला आदि जैसी  अनेक संस्थाएं उन लोगों से भरी जा रही हैं जिन्हें उन विधाओं से कोई लेना देना नहीं है.

सोमवार, 3 जून 2013

लैपटॉप वितरण

पत्रकारों की गलतफहमियां -

(बहस का सवाल तो तब खड़ा होता जब ये लैपटॉप देकर वोट ले रहे होते, पर इन्होने अपने राजनैतिक घोषणा पत्र में यह बात राखी थी की यदि मेरी सरकार आती है तो मुफ्त में लैपटॉप और टेबलेट देंगे. स्वाभाविक है की यह काम इन्हें करना है इसके लिए इनकी इस तरह निंदा किया जाना की रुपये लुटाये जा रहे हैं जायज नहीं है)

"एक बात और महत्त्व की है की उत्तर प्रदेश जिस तरह की राजनैतिक संकट का शिकार है उससे निजात पाना जरा  ही नहीं  बहुत मुश्किल काम लगता है, सपा की सरकार हो या बसपा की ये राजनैतिक दल उनके वोटो पर खड़े है जो परंपरा से चले आ रहे सत्ता प्रतिष्ठानों से अलग एक अलग राज्य व्यवस्था देने/पाने को लालायित थे.
समाजवादी का नारा था - 'समाजवादियों ने बाँधी गाँठ, पिछड़ा पाए सौ में साठ' और बसपा ने नारा दिया था - जिसकी जीतनी भागेदारी उसकी उतनी हिस्सेदरी, एक और नारा था - ठाकुर बाभन बनिया चोर, इनको मरो जुते चार ! इनका आशय था समाज के वो लोग जो मुख्यधारा से काट दिए गए हैं, उन्हें उम्मीद थी इन विचारधारा की सरकारों के आने से उन्हें मौका मिलेगा पर ऐसा हो नहीं रहा है. आज का संकट अलग तरह का है की इन पार्टियों के मुखियायाओं ने उनकी याचना में लगे हैं जिनसे जनता ने सबकुछ छीन कर इन्हें सौंपा है. और उनकी औलादें इनकी शकल तक नहीं देखना चाहती हैं देखें यह लिंक -http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2013/05/130531_laptop_gi_ak.shtml."

डॉ.लाल रत्नाकर 

लैपटॉप पर करोड़ों रुपए लुटाना कितना जायज़?

 मंगलवार, 4 जून, 2013 को 07:18 IST तक के समाचार
अखिलेश यादव
अखिलेश यादव ने लैपटॉप बांटने का सिलसिला राजधानी से शुरू किया.
क्लिक करेंसमाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनावों के पहले एक ऐसा वादा किया जो कम से कम इस प्रदेश के लिए नया था.
मुलायम सिंह की पार्टी ने कहा था कि अगर प्रदेश में उनकी क्लिक करेंसरकार बनती है तो वे कक्षा 10 और 12 पास करने वाले सभी स्कूली बच्चों को मुफ्त में टैबलेट और लैपटॉप देंगे.
भारी बहुमत से प्रदेश में क्लिक करेंअखिलेश यादव की सरकार बनी और अपने कार्यकाल के पहले वर्ष में ही उसने दस हज़ार स्कूली बच्चों को मुफ्त लैपटॉप बांटे.
अभी लाखों बंटने बाकी है और इस पूरी क्लिक करेंयोजना की लागत आने वाली है लगभग तीन हज़ार करोड़ रूपए.
इस योजना के साथ उत्तर प्रदेश भी भारत के उन तमाम राज्यों में शुमार हो चुका है जहाँ विभिन्न राजनीतिक दलों ने क्लिक करेंमतदाताओंको रिझाने के लिए बड़े-बड़े चुनावी वादे किए हैं.

खस्ताहाल

उत्तर प्रदेश
उत्तर प्रदेश के हजारों गाँव आज भी बिना बिजली के हैं.
लगभग 19 करोड़ की क्लिक करेंआबादी वाले उत्तर प्रदेश को भारत में सबसे ज्यादा जनसंख्या वाले राज्यों में गिना जाता है.
प्रदेश में, बड़े शहरों को छोड़ दें तो, अब भी मूलभूत क्लिक करेंसुविधाओं का अभाव है.

कुछ रोचक चुनावी वादे

तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2011-
डीएमके ने हर परिवार को मुफ्त रंगीन टीवी देने का वादा किया.
उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव 2012-
भाजपा ने हर बीपीएल परिवार को एक गाय मुफ्त देने का वादा किया था.
गुजरात विधानसभा चुनाव
2012-कांग्रेस ने छात्रों के लिए मुफ्त लैपटॉप और टैबलेट देने का वादा किया था.
हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव 2012-भाजपा ने मुफ्त इलेक्ट्रिक इंडक्शन हीटर देने का वादा किया था.
कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2013-भाजपा ने छात्रों को मुफ्त लैपटॉप और टैबलेट देने का वादा किया. गरीब परिवारों को एक रूपए प्रति किलोग्राम की दर से हर महीने 25 किलो चावल देने का भी वादा.
राज्य में जितनी क्लिक करेंबिजली की ज़रुरत है उससे लगभग 14% कम मिल पाती है.
राज्य से गुजरने वाले क्लिक करेंराष्ट्रीय राजमार्गों के अलावा सड़कों को मरम्मत की ज़रुरत है और गांवों में आज भी पक्की सडकें एक सपना है.
प्रदेश के ज़्यादातर क्लिक करेंग्रामीण इलाकों से लोग आज भी इलाज वगैरह के लिए बड़े शहरों की ओर रुख करते हैं.
ऐसे में क्लिक करेंचुनावी वादे के नाम पर हजारों करोड़ खर्च करना कितना जायज़ है?
राजनीतिक विश्लेषक पुष्पेश पंत को लगता है समस्या सोच की है.
उन्होंने बताया, "आज़ादी के कुछ दशक बाद से ही राजनीतिक दलों को लगने लगा था कि मतदाताओं को लुभाने के लिए कुछ नया करना पड़ेगा. हालांकि अभी भी चुनावों के पहले प्रचार में कई तरह के गलत काम होते हैं, लेकिन इस तरह वादों को करना सबसे आसान है. आपका पैसा भी नहीं लगता और काम भी पूरा हो जाता है".

विकास

"लैपटॉप जैसे कीमती चीज़ लोगों को मुफ्त में बांटने का कोई तुक ही नहीं "
प्रशांतो रॉय, आईटी पत्रकार
उत्तर प्रदेश सरकार को लगता है कि विकास की दूसरी चीज़ों पर ध्यान देने के साथ-साथ लैपटॉप और टैबलेट बांटने में कोई गलत बात नहीं है.
अभिषेक मिश्रा समाजवादी सरकार के सबसे व्यस्त मंत्रियों में गिने जाते हैं.
उनका कहना है, "क्या इसका मतलब ये है हम सफाई व्यवस्था पर ध्यान दें और आईटी शिक्षा पर नहीं? क्या हम सिर्फ सड़कों और बिजली पर ध्यान दें और प्रदेश के लोगों को विज्ञान और तकनीकी मामलों में पिछड़ जाने दें? नहीं...हमें दोनों चीज़ों पर बराबर ध्यान देने की ज़रुरत है. प्रदेश में पहले से व्याप्त डिजिटल डिवाइड को और बढ़ने नहीं दे सकते".
वैसे उत्तर प्रदेश से पहले भारत के कई अन्य राज्यों में भी राजनीतिक दलों ने लैपटॉप और कंप्यूटर बांटने के लिए वादे किए हैं.
कुछ ने बांटे भी और कुछ की सरकारें ही नहीं बन सकीं. हालांकि विश्लेषक फिर भी मानते है कि भारत जैसे देश में लैपटॉप जैसी चीज़ को मुफ्त बांटना कारगर नहीं है.
आईटी क्षेत्र के वरिष्ठ पत्रकरों में से एक प्रशांतो कुमार रॉय को ये पहल व्यर्थ लगती है.
उन्होंने कहा, "अगर आप करोड़ खर्च करने जा रहे हैं तो ज़रूरी है तय करना कि उसका उपयोग सबसे ज्यादा किस क्षेत्र में होगा. लेकिन राजनीतिक दल इस सवाल को छूते तक नहीं क्योंकि उनका निशाना सिर्फ अगले चुनावों तक होता है. इसी तरह आम लोगों का पैसा ज़ाया होता चला जाता है."

बुधवार, 8 मई 2013

रेवड़ियाँ

रेवड़ियाँ बंटते ही बदला नजारा -
(सत्ता मद में जब दिखाई नहीं देता - स्वार्थ ही स्वार्थ घेरे रहता है यही कारण है की सारा समय ऐसो आराम में निकल जाता है)
उत्तर प्रदेश में प्रतिभा का तो मतलब ही नहीं है, संज्ञान में आया है की कई ऐसे संस्थानों के अध्यक्ष/उपाध्यक्ष ऐसे लोगों को बनाया गया है जिनका उस विधा से दूर दूर तक कोई ताल्लोक नहीं है। इतना फूहड़ प्रदर्शन किसी सरकार में नहीं हुआ होगा।
आखिर क्यों करते हैं ये ऐसा ? यही सवाल बार बार दिमाग में आता है अंततः ये मुरख खल .........आदि  आदि कहकर शांत होना ही सुखकर है। (चंचल की बात भी सही है की ये सरकार है) 
वाह उत्तर प्रदेश सरकार के 'ओहदेधारी' क्या चकाचक 'लालबत्ती' वाली फूलों से लदी सरकारी कार और गाँव गली और चौराहे की सड़कें और स्कवाएड करता पुलिस दस्ता लोग 'चहककर कहते फलनवा' जा रही है। शिवपाल ने मंत्री का दर्ज़ा दिया है 'संगीत और कला की मंत्री बनाया है' जो सुभाष पांडे थे पिछली सरकार में 'अचरज' इसलिए नहीं हो रहा था, शायद यही यहाँ की अवाम के लिए सुखद था उनकी नजर में वे इसे 'इसी को 'भाग्य' कहते हैं' "पिछलि सरकार में यही हाल था उत्तर प्रदेश राज्य ललित कला अकादमी का और इस सरकार में 'वही' हाल 'उपाध्यक्षा' जिस तरह से गाँव में लोकप्रियता और स्वागत प्राप्त कर रही हैं सचमुच भाग्यशाली ही हैं। पर कला और कला अकादेमी के लिए यह कहना उपयुक्त होगा की - भैंस के आगे बिन बजाये, भैंस खड़ी पगुराय।।
काश ये संस्थायें अपनी नियति को उजागर कर पातीं और 'समाज' तक पहुंचता इनका असली स्वरुप समाजवादी तरीके से। लेकिन दुर्भाग्य यही है की इन्होंने बिलकुल वही किया जों अब तक तिकड़मों से सारी संस्थाओं में होता आया है। तब यहाँ वो बैठे जिन्हें हुनर था कि सबकुछ केवल और केवल अपनों के लिए ही  है, पर अब जो आये हैं वे क्या करेंगें।

ईश्वर जानें .
टिपण्णी -
Omprakash Kashyap आपने हकीकत बयान की है रत्नाकर जी. ये लोग समाजवाद का नारा देकर सत्ता में आए हैं. समाजवाद में वैज्ञानिकता के समर्थक माकर्स का मानना था कि बदलाव की बात बहुत हो चुकी, आवश्यकता बदलाव लाने की है. राजनीति की विडंबना ही यही है कि यहां सत्ता में आने के साथ ही बदलाव लाने का संकल्प भुला दिया जाता है. सत्ता केवल एक चरित्र जानती है, वह है शासक का. सुविधाओं को हड़पकर समाज के बड़े वर्ग को सत्ता और संसाधनों से बेदखल कर देने का. 

आपकी कविताएं और टिप्पणियां देखता रहता हूं. उनमें सच्चे कलाकार की सदभावनाएं झलकती हैं, जो किसी भी वर्ग—भेद से परे, केवल लोककल्याण की सोचता है. जो सही मायने में बदलाव का समर्थक है. कुछ हटकर सोचना—पढना अच्छा लगता है. उम्मीद भी इसी से है.

गुरुवार, 2 मई 2013

राजनैतिक होने के खतरे बहुत हैं

बहन जी और नेता जी को ब्राह्मण मोह होने के कारण उनका दलितों और पिछड़ों से मोह घट रहा है, या यूँ कहें की ये दलितों और पिछडों को अपनी जागीर समझते हैं।
उत्तर प्रदेश का सच ये है की मा-कांशीराम (के दलित मूवमेंट) ने कांग्रेस के पम्परागत वोटर काटकर अलग किये और राज्य का राजनैतिक स्वरुप बदला कांग्रेस ख़तम हो गयी ब्राहमणों की बची खुची राजनीति को वी-पी - सिंह की 'लहर' ने ख़त्म किया।
कहीं से भाजपा ने कुछ ब्राह्मणों को बटोरा या कहें इनको यहाँ संभावानाएं दिखीं और ये सब इधर एकजूट हुए पर यह मामला स्थायी नहीं लगा देश के बहुतेरे हिस्से से अन्य जातीय समीकरणों ने ब्राह्मणों की सत्ता की चुनौती को स्वीकार नहीं किया और 'नागपुर' के अलावा अन्य 'सवर्ण' जातियों को भी संभवतः ये रास नहीं आये और इन्हें किनारे कर दिया।
"जाएँ तो जाएँ कहाँ" की हालत में 'बहन' जी का दामन पकड़ा और पुनः उत्तर प्रदेश की राजनीति में 'दखल' की पुरजोर साजिश हासिल की। (साजिश इसलिए की सत्ता के भूखे ये इस नए समीकरण में दाखिल हुए) यह प्रयोग बहनजी को भी भा गया, पर इस अभियान से दलित बुद्धिजीवी और अफसर दोनों सशंकित था की यह 'समीकरण' जिसे किसी तरह तोड़ा गया था। पुनः उसी समीकरण में वापसी इतनी भयावह होगी इसका अंदाजा तब लगा जब लूट की सारी जिम्मेदारी बहन जी के मत्थे आयी। (इस काल के घोटालों की लिस्ट में नामों को देखा जा सकता है)
यदि यही सब चलता रहा तो आज की प्रातः कालीन बहस का यह विन्दु की 'दलित और पिछड़े एक नहीं होने दिए जायेंगे' की चुनौती में दम दीखता है, क्योंकि जिस तरह से दोनों नेताओं में ब्राह्मणों में घुसपैठ की होड़ लगी है, उससे तो यह बात और प्रभावी हो जाती है, जो चिंता का विषय तो है पर संभावनाएं  यहीं समाप्त नहीं हो जातीं, पिछड़ों के अगड़े और दलितों के सुविधाभोगी मूल रूप से इस आन्दोलन के लिए खतरनाक साबित होंगें जबकि इन्ही से आशा की जाती है की ये ही आन्दोलन को आगे ले जा सकते हैं।
अब सवाल है की यह आन्दोलन जीवित तो है, संभावित भी है संयोजन कैसे हो, किसका कितना हिस्सा हो राज्य में या आन्दोलन में, यहीं से इमानदारी और त्याग की जरूरत दिखती है। अब पहल कहाँ से हो कौन आगे आये क्रियान्वयन के लिए।
इस आन्दोलन की शकल राजनैतिक होने के खतरे बहुत हैं आंतरिक और वाह्य दोनों, इनसे उबरना होगा अब जैसे जो नए पिछड़े बने हैं उनकी इस सामजिक आन्दोलन के प्रति उतनी इमानदारी नहीं है, सबकी अपनी समस्याएं भी हैं उनका  निदान कैसे हो।
यह सब मुद्दे हैं जिनपर हमें कार्य योजना बनानी है इसके विशेषग्य अपनी राय दें तो यह आन्दोलन आगे आ सकता है, नेत्रित्व की भी आवश्यकता होगी जिसे आर्थिक मदद भी जुटानी होगी इन सबसे जटिल होगा बुद्धिजीवियों का विश्वास हासिल करना और बिकने वालों से बचना भी। 
-संयोजक 

मंगलवार, 30 अप्रैल 2013

देशभक्त

 भ्रष्टाचार को 'शिष्टाचार' की शक्ल देती कांग्रेस 
इनके सहयोग में खड़े दलित और पिछड़े नेत्रित्व 


भारत सरकार 'आकंठ भ्रष्टाचार' में डूबी है, लूट की छुट अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त कर चुकी है, लगता है पिछले दिनों चले 'भ्रष्टाचार मिटाओ' आन्दोलनों का लब्बो लुबाब मतलब यही दिखाई देता है की किस तरह से भ्रष्टाचार को 'शिष्टाचार' की शक्ल दे दी जाय। और यही हुआ 'कांग्रेस' ने एक न एक 'कुकर्मो' को इस पुरे आन्दोलनों से जोड़कर 'बलात्कार' के इतने रूप प्रस्तुत किये की  सारा भारत देश मध्यकाल युग में पहुँच गया है, विकास की खोखली नीतियों से समकालीन दिक्कतें भले ही दिखाई नहीं दे रही हों पर जो कुछ हो रहा है उससे देश निश्चित तौर पर जिधर जा रहा है वह सामाजिक गैर बराबरी को बढ़ाएगा।
इसी व्यवस्था के सुधार और बदलाव के जिस स्वरुप की मुझे आवश्यकता है उसको लागू करने की कुवत किसी मौजूदा नेता में नज़र नहीं आ रही हैं। अब नया नेतृत्व कहाँ से लाया जाय ! 

"सरबजीत की मदद में भारत सरकार आगे क्यों नहीं आ रही है, सोनिया गांधी को यह देश बर्दास्त कर रहा है या सोनिया गांधी इस देश को बर्बाद कर रही है इस सवाल पर सब चुप क्यों है ? यदि कोई सच्चा देशभक्त शासक होता तो सरबजीत की मदद में जरूर आगे आता।"
-डॉ.लाल रत्नाकर 

सोमवार, 22 अप्रैल 2013

उ .प्र . की राजनीती में ब्राह्मणों के दिन.

डॉ . लाल रत्नाकर 

क्या हो गया है माननीय नेता जी को -

यह वकालत राहुल गांधी को प्रधान मंत्री बनाने की है या .... .....!

माननीय नेता जी ये सारे मिलकर आपका खून पी जायेंगे और समाजवाद सूख जाएगा क्योंकि इन्हें आपके 'राज्य से जीतनी चिढ है संभवतः दुनिया की किसी कौम को नहीं होगी । यदि सारी ऊर्जा इन पर आपने लगा दी तो औरों का क्या होगा ? पूरा इतिहास इन्होने अपने नाम कर लिया जबकि उनका कोई योगदान संघर्ष में नहीं होता था मायावती के राज्य में इनके सारे गुंडों ने लूटा और जो बचे थे ओ आपके समय में लूट रहे हैं।
आपकी यह थियोरी जिसने भी गढ़ी हो पर यह सब किस ब्राह्मण ने गढ़ी है ठीक से पता नहीं पर 
"ब्राह्मण ऋषि मुनियों की देन 'ब्राह्मणवाद' है"।

'समाजवाद' तो दलित और पिछड़े ऋषि मुनियों ने दिया है नेताजी।

आपको 'मनुस्मृति' आदि कभी पढ़ने का मौक़ा मिला क्या? 

यदि नहीं तो पढ़वा डालिए किसी गैर ब्राह्मण से .

क्या हो गया है आपको जो मर्जी वही बोले जा रहे हो। क्या ये सब उनके लिए रामबाण नहीं हैं .

सामाजिक सरोकारों के मसीहा ललई राम यादव, राम स्वरुप वर्मा, राम सेवक यादव की याद आपको क्यों नहीं आ रही है। 
जनेश्वर मिश्रा तो पूरे जीवन समाजवाद के नाम पर ''ब्राह्मणवाद'' ही किया. और उस आदमी के नाम पर इस तरह के स्मारक तो समाजवाद के नाम पर कलंक हैं।
इस देश का कोई ब्राह्मण आपको प्रधानमंत्री की कुर्सी पर कभी नहीं बैठने देगा नेताजी आप अच्छी तरह इस बात को समझ लीजिये। 
जो ब्राह्मणवादी होगा वो समाजवादी हो ही नहीं सकता .
जरा इनके फरमानों पर गौर करिए "ब्राह्मण समाज की मांगों पर त्वरित कार्रवाई के निर्देश देते हुए उन्होंने कहा कि सपा सरकार में 13 मंत्री ब्राह्मण समाज से हैं। माता प्रसाद पांडेय दूसरी बार विधानसभा अध्यक्ष बने हैं। सपा ने ब्राह्मणों को सर्वाधिक सम्मान दिया है।"
अरे भाई इनका काम कहीं रूकने जा रहा है और एक जाती का नाम लेकर आदेश जारी किया जाना कितना उचित है, यह शर्मनाक हरकत भी यादवों के मत्थे मढी जा रही है।
"नेताजी आप पिछड़े सामाज को कितनी तरजीह दे रहे हो जहां देखो वहीँ ब्राह्मण समाज - यादवों की तो छोडो उससे से तो आपको दुर्गन्ध आने लगी है" आपके इस ब्राह्मणवाद में कहीं भी किसी जाती को बढ़ावा देने की "बू" नहीं आ रही होगी . भाई लोगों को " जो आपको बिना पानी पिए गालियाँ देते रहते हैं.
-डॉ.लाल रत्नाकर 
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समाजवाद ब्राह्मण ऋषि मुनियों की देन: मुलायम
लखनऊ/ब्यूरो | अंतिम अपडेट 26 अप्रैल 2013 11:46 PM IST पर
समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने प्रबुद्ध वर्ग सम्मेलन के नाम पर ब्राह्मण समाज को लुभाने की भरपूर कोशिश की।
उन्होंने कहा कि समाजवाद ब्राह्मण ऋषि-मुनियों की ही देन है। सपा और प्रदेश सरकार ब्राह्मण के सम्मान और उनकी उम्मीदों के अनुरूप काम करेगी।
ब्राह्मण समाज की मांगों पर त्वरित कार्रवाई के निर्देश देते हुए उन्होंने कहा कि सपा सरकार में 13 मंत्री ब्राह्मण समाज से हैं। माता प्रसाद पांडेय दूसरी बार विधानसभा अध्यक्ष बने हैं। सपा ने ब्राह्मणों को सर्वाधिक सम्मान दिया है।
बसपा के ब्राह्मण भाईचारा सम्मेलन के जवाब में सपा ब्राह्मण सभा ने शुक्रवार को सपा मुख्यालय में प्रबुद्ध वर्ग महासम्मेलन आयोजित किया।
इसमें बसपा के ब्राह्मण प्रेम को ढोंग बताते हुए सपा को ब्राह्मणों का हितैषी साबित करने की कोशिश की गई। इस मौके पर मुलायम सिंह यादव ने कहा कि आदिकाल से आजादी के आंदोलन तक ब्राह्मणों ने समाज को दिशा दी।
समाज को जगाया और आगे बढ़ाया। वेद व्यास, भगवान परशुराम और ब्राह्मण ऋषि-मुनियों ने आध्यात्मिक ज्ञान दिया। वे किसी पर अत्याचार नहीं करते थे लेकिन अन्याय के खिलाफ हथियार तक उठाने में भी पीछे नहीं रहे।
जातिवाद से दूर वे मानवतावादी थे। सम्मेलन में उठी संस्कृत विद्यालयों की उपेक्षा के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि संस्कृत खत्म हुई तो सभी भाषाओं पर आघात लगेगा।
हिंदी और दूसरी क्षेत्रीय भाषाएं संस्कृत से ही विकसित हुई हैं। जन्म से लेकर मृत्यु तक संस्कृत के श्लोक काम आते हैं। संस्कृत की उपेक्षा नहीं होगी।
सपा प्रवक्ता और कैबिनेट मंत्री राजेंद्र चौधरी को निर्देश देते हुए मुलायम ने कहा कि जिन ब्राह्मणों पर पिछली सरकार में एससी-एसटी एक्ट के झूठे मामले दर्ज हुए थे, वे वापस कराए जाएं।
उन्होंने कहा कि 307 एकड़ में जनेश्वर मिश्र पार्क विकसित किया जा रहा है। इसमें उनकी बड़ी मूर्ति लगाई जाएगी। �
अगली कैबिनेट में लाइये संस्कृत विद्यालयों का मामला
संस्कृत विद्यालयों को अनुदान पर लेने के मामले पर मुलायम सिंह ने मंच पर बैठे रामगोविंद चौधरी और राजेंद्र चौधरी से कहा कि सरकार ने अभी तक यह काम क्यों नहीं किया। हो सकता है कि अखिलेश को पता न हो। इसे अगली कैबिनेट में लाइये।
बसपा राज में ब्राह्मणों का सर्वाधिक उत्पीड़न: पांडेय
समाजवादी पार्टी ब्राह्मण सभा के प्रदेश अध्यक्ष और कृषि एवं धर्मार्थ कार्य राज्यमंत्री मनोज पांडेय ने कहा कि बसपा शासन में ब्राह्मणों का सर्वाधिक उत्पीड़न हुआ। उन पर एससी-एसटी एक्ट के 15 हजार मामले दर्ज किए गए।
ब्राह्मण मंत्रियों, नेताओं ने किया सपा का गुणगान
सम्मेलन में ब्राह्मण समाज से जुड़े मंत्रियों और प्रमुख नेताओं ने सपा की नीतियों और मुलायम सिंह के नेतृत्व का गुणगान किया। उन्होंने मुलायम को प्रधानमंत्री बनाने का आह्वान किया।
होमगार्ड मंत्री ब्रह्माशंकर त्रिपाठी ने परशुराम जयंती पर अवकाश और प्रमोशन में आरक्षण के खिलाफ लड़ाई का जिक्र करते हुए संकल्प दिलाया कि ब्राह्मण समाज मुलायम सिंह को दिल्ली पहुंचाने के लिए काम करें।

समाजवाद का नया चहरा 

उ .प्र . की राजनीती में ब्राह्मणों के दिन इतने ख़राब होंगें यह उन्होंने सोचा भी नहीं होगा .
लेकिन सारे संघर्षों का परिणाम इतना भयावह होगा जिसकी संघर्ष चलाने /करने वालों ने कभी सोचा भी नहीं रहा होगा, सदियों के संघर्षों के बाद जिन साजिशों से निकलने और समता के राज्य की स्थापना के लिए अपने हकों हुकुक का सपना देखा रहा होगा यदि उसमें से कोई ज़िंदा होगा तो उसपर क्या गुजर रहा होगा।
पर कितने अदूरदर्शी हैं सपाई व् बसपाई की वे उनके चाल में फसते जा रहे हैं .जिस जनता को इन्होने ये भरोसा दिया था की ये उनके सपनों का राज कायम करेंगे और आज तुम उनकी याचना करके, उनके द्वारा किये गए अपमानों के बदले उनका सम्मान कर रहे हो जबकि इन्हीं के विरोध के लिए जनता ने तुम्हे चुना है।

बसपा को इन्ही (ब्राह्मणों) से आस है 'धन्य हो मूर्खों इनसे क्या निकाल पाओगे ये उलटे तुम्हें निगल जायेंगे' अरे भाई हाथ ही मिलाना है तो आपस में मिलाओ !

(माया और मुलायम न माने तो इन्हें छोडो) नया गठबंधन बनाओ (दलित + पिछड़े =85% मत यानी सत्ता)

क्योंकि दोनों को सत्ता सुख ने 'सवर्ण' बना दिया है, इनकी सोच बदल गयी है।

ये 'मुर्ख और गुंडों के बल पर देश और समाज को कमजोर कर रहें हैं - जिस सामजिक बदलाव के आन्दोलन से इनकी उत्पत्ति हुयी है उसका ही ये विनाश कर रहे हैं।

समय रहते इनसे सावधान हो जाओ अन्यथा आने वाली पीढियां हमें माफ़ नहीं करेंगी  -

नया गठबंधन बनाओ (दलित + पिछड़े =85% मत यानी सत्ता)

जबकि सच्चाई यह है की आज भी ब्राह्मण पिछड़ों और दलितों का जितना नुकसान हो सकता है कर रहा है  पर इनके नेताओं को 'दुर्बुद्धि ने घेरा' हुआ है इनमे बौद्धिकता से भय बना हुआ है, इन्हें अपने बौद्धिक नहीं चाहिए उधर से उधार के बुद्धिमान आयातित हैं जो अंग्रेजों जैसा इनको लूट रहे हैं और सामाजिक बदलाव को नस्त नाबूत कर रहे है .
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सम्मान के लिए आगे आए ब्राह्मण समाज
Jaunpur | अंतिम अपडेट 22 अप्रैल 2013 5:30 AM IST पर
बक्शा। सपा के ब्राह्मण संकल्प सम्मेलन में मुख्य अतिथि विधानसभा अध्यक्ष माता प्रसाद पांडेय ने कहा कि ब्राह्मण समाज को अपने सम्मान की रक्षा के लिए आगे आना होगा। सपा सरकार में ब्राह्मणों का सम्मान निश्चित रूप से बढ़ा है। ब्राह्मण समाज सदैव कल्याण की सोच एवं सभी के सुख की कामना करता रहा है। इसीलिए उन्हें गुरु की महत्ता प्रदान की गई है। सम्मेलन में 11 ब्राह्मणों ने शंखनाद कर डा. केपी यादव को विजयी बनाने का संकल्प दिलाया।
धनियामऊ स्थित भोलानाथ मिश्र डिग्री कालेज परिसर में ब्राह्मण लोक चेतना मंच के तत्वावधान में आयोजित सम्मेलन में विधानसभा अध्यक्ष ने कहा कि बसपा शासन में सबसे अधिक दलित उत्पीड़न का मुकदमा ब्राह्मणों पर ही दर्ज हुआ है। प्रमोशन में आरक्षण का विरोध सिर्फ सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने किया। उन्होंने कहा कि ब्राह्मण समाज ने हमेशा राजा के मंत्री के रूप में काम किया है। इस बात के चिंतन की जरूरत है कि वर्तमान में समाज कहां खड़ा है। लोकसभा प्रत्याशी डा. केपी यादव को दिल्ली और नेता मुलायम सिंह यादव को प्रधानमंत्री बनाने की अपील की। सम्मेलन में हेलीकाप्टर से पहुंचे विशिष्ट अतिथि ज्ञानपुर विधायक विजय मिश्र ने कहा कि सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव को प्रधानमंत्री बनाने का संकल्प लेना होगा। जौनपुर का ब्राह्मण मतदाता डरा एवं सहमा हुआ है। विरोधी हमला तब करता है जब आप भयभीत होंगे। संकट के समय में साथ देने का कार्य सपा करती है। भोजपुरी अभिनेता मनोज तिवारी मृदुल ने गीतों के जरिए समा बांधा। आह्वान किया कि नेताजी को इस बार प्रधानमंत्री बनाना है। राज्यमंत्री सतई राम यादव, संगीता यादव, जफराबाद विधायक शचींद्र नाथ त्रिपाठी, पूर्व एमएलसी लल्लन यादव, दीवानी बार अध्यक्ष प्रेम शंकर मिश्र, जिलाध्यक्ष राज बहादुर यादव, चित्रकूट विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. वी पांडेय, सुशील दुबे, पूनम मौर्या, राहुल दुबे, उमेश तिवारी, बांकेलाल शर्मा आदि ने संबोधित किया। कालेज प्रबंधक प्रेम शंकर मिश्र ने अतिथियों को अंगवस्त्रम एवं स्मृति चिन्ह भेंट किया। अध्यक्षता बदलापुर विधायक ओेम प्रकाश दुबे उर्फ बाबा तथा संचालन सुरेंद्र उपाध्याय ने किया। अंत में लोकसभा प्रत्याशी डा. केपी यादव ने सभी के प्रति आभार जताया। इस दौरान लोकगीत गायक आशीष पाठक ने अपनी टीम के साथ लोगों का मनोरंजन किया। इस मौके पर रमापति यादव, डा. अवधनाथ पाल, श्रवण जायसवाल, राजनाथ यादव, रमेश चंद्र यादव, रत्नाकर सिंह कौशिक, रामधारी पाल, महावीर यादव आदि मौजूद रहे।
चुनावी रैली की तरह उतरा हेलीकाप्टर
बक्शा। सपा ब्राह्मण सम्मेलन में रविवार को धनियामऊ स्थित भोलानाथ मिश्र डिग्री कालेज के मैदान में चुनावी रैली की तरह हेलीकाप्टर उतरा तो देखने के लिए लोगों की भीड़ लग गई। विधानसभा अध्यक्ष माता प्रसाद पांडेय सड़क मार्ग से सम्मेलन में हिस्सा लेने पहुंचे तो ज्ञानपुर के विधायक विजय मिश्र कार्यक्रम स्थल के बगल में सीधे हेलीकाप्टर से पहुंचे। लोग कहने लगे कि अब लोकसभा चुनावी समर शुरू हो गया है। बच्चों को नियंत्रित करने के लिए पुलिस फोर्स भी हेलीपैड के चारो तरफ लगी रही। 
सम्मेलन में विजय मिश्र ने कहा कि अगर समाज डरा हुआ है तो कुछ दिन जौनपुर में रुक जाऊं। मैं शस्त्र और शास्त्र दोनों लेकर चलता हूं। किसी का नाम लिए बगैर ज्योतिषी रमेश तिवारी एवं अनिल मिश्रा की हत्याकांड का हवाला देकर ब्राह्मणों को सपा के पक्ष में लामबंद होने की अपील की।
मनोज ने सुनाया माई शेर पर सवार......
बक्शा। ब्राह्मण सम्मेलन में डा. केपी यादव के समर्थन में पहुंचे भोजपुरी फिल्म स्टार मनोज तिवारी ने जब माई शेर पर सवार रूपवा मनवा मोहत बा... सुनाया तो परिसर तालियाें की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। भीड़ मनोज तिवारी को देखने के लिए खड़ी हो गई। भीड़ एक और एक और गाना सुनाने की मांग करने लगी। भीड़ को शांत कराने के लिए उन्होंने एक गीत और सुनाया फिर समय की कमी का अनुरोध करते हुए चले गए।
बिजली संकट पिछली सरकार की देन
बदलापुर। विधानसभा अध्यक्ष माता प्रसाद पांडेय ने स्थानीय पीडब्ल्यूडी गेस्ट हाउस में पत्रकारों से बातचीत में कहा कि प्रदेश में बिजली संकट पिछली सरकार की देन है। पिछली सरकार ने 2600 करोड़ की बिजली उधार खरीदी थी। उसी की भरपाई की जा रही है। प्रदेश सरकार हर महीने 1600 करोड़ की बिजली खरीद रही है और बिजली से पंद्रह सौ करोड़ आ रहे हैं। हम प्रति यूनिट 1.36 रुपये उपभोक्ताओं को अनुदान दे रहे हैं। बंद पड़े विद्युत उपकेंद्र जल्दी ही चालू किए जाएंगे। वह यहां धनियामऊ के सपा सम्मेलन में हिस्सा लेने आए थे। सम्मेलन से पहले बातचीत में उन्होंने ब्राह्मण समाज के लोगों से सपा के पक्ष में लामबंद होने की अपील की। इस दौरान बदलापुर विधायक ओम प्रकाश दुबे समेत काफी संख्या में सपा कार्यकर्ता मौजूद थे।

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

बदलाव के उद्येश्य से .

ब्लागर के व्यवस्थापक

पाठक !
आदरणीय
यह ब्लागर के माध्यम से एक विल्कुल अव्यवसायिक अराजनैतिक मात्र सामाजिक बदलाव के उद्येश्य से किया जा रहा प्रयास है, 2 0 1 4 का जिक्र उस प्रक्रिया की वजह से किया जा रहा है जिसमें सामजिक सरोकार बनते और बिगड़ते हैं।
सामाजिक जुडाव का सुअवसर मिलता है।
बुरे के खिलाफ खड़े होने का अवसर भी।
भारत गनराज्य की एकता अखण्डता का पर्व होता है 'आम चुनाव'.
इसी उद्येश की पूर्ति सजग अवाम से अपेक्षित भी है.
इसी उद्येश्य से .
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ब्लागर के व्यवस्थापक

पाठक !
आदरणीय
यह ब्लागर के माध्यम से एक विल्कुल अव्यवसायिक अराजनैतिक मात्र सामाजिक बदलाव के उद्येश्य से किया जा रहा प्रयास है, 2 0 1 4 का जिक्र उस प्रक्रिया की वजह से किया जा रहा है जिसमें सामजिक सरोकार बनते और बिगड़ते हैं।
सामाजिक जुडाव का सुअवसर मिलता है।
बुरे के खिलाफ खड़े होने का अवसर भी।
भारत गनराज्य की एकता अखण्डता का पर्व होता है 'आम चुनाव'.
इसी उद्येश की पूर्ति सजग अवाम से अपेक्षित भी है.
इसी उद्येश्य से .
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मंगलवार, 16 अप्रैल 2013

लगता है समझ आ रही है !

सपाइयों को गुंडा नहीं पसंद तो दहशतगर्द कहूंगी: माया
लखनऊ/अमर उजाला ब्यूरो | अंतिम अपडेट 16 अप्रैल 2013 8:33 PM IST पर
Mayawati says Narendra Modi is not secular, SP men are terrorists
बसपा सुप्रीमो मायावती ने एक बार फिर सपा के साथ जुबानी जंग जारी रखी।उन्होंने कहा कि सपा को अगर गुंडा शब्द पर ऐतराज है तो वह उन्हें भविष्य में ‘बेलगाम एवं दहशतगर्दी तत्व’ कहेंगी। बसपा सुप्रीमो ने कहा कि प्रदेश में अराजकता और जंगलराज के साथ सपाई गुंडों और बदमाशों का राज कायम है लिहाजा राज्यपाल और केंद्र को तत्काल प्रदेश सरकार को बर्खास्त कर देना चाहिए। उन्होंने कहा कि राज्यपाल और केंद्र सरकार जब तक इस संबंध में कार्यवाही नहीं करेंगे, वह हर प्रेस कांफ्रेंस में अपनी यह मांग दोहराती रहेंगी। पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रदेश में गरीबों, इज्जतदार लोगों, शरीफ लोगों और मां-बहन-बेटियों का अमन-चैन के साथ जिंदगी बिताना मुश्किल हो गया है। भविष्य में बसपा की सरकार बनती है तो इस किस्म के आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों को कानून के तहत इतना सख्ती से तोड़ा जाएगा कि भविष्य में आपराधिक कृत्य करने से पहले कई बार सोचेंगे।सपा के राष्ट्रीय महासचिव शिवपाल सिंह यादव के बयान पर पलटवार करते हुए मायावती ने कहा कि सपा के एक साल के कार्यकाल में हर तरह के अपराध बढ़े हैं। जांच के नाम पर उगाही हो रही है। प्रदेश की गंभीर घटनाओं पर सरकार घटना के मुख्य दोषी के खिलाफ सख्त कार्रवाई के बजाय उनकी मदद के लिए वहां के अफसरों को बदलकर उनके मनमाफिक अफसरों को भेज देती है। ऐसा करके वह अपने बेलगाम, दहशतगर्द, अराजक असामाजिक तत्वों को बढ़ावा दे रही है।
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लगता है समझ आ रही है! लेकिन गाँव से जो सन्देश आ रहा है वह बिलकुल भिन्न है। इनकी सरकार का ग्राफ बिलकुल नीचे जा रहा है,,एक का ही नहीं दोनों का