सोमवार, 13 जुलाई 2026

चले जाओ यहां से तुमने ही मेरे बेटे को मारा है।

  नीच और तड़ीपार है तो मुमकिन है 


नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री की कुर्सी ऐसे ही छोड़ देगा? मौत का सौदागर है खून की नदियां बह जाएगी और कुर्सी नहीं छोड़ेगा।

एक थे हरेन पंड्या, अस्ट्रॉनॉट सुनीता विलियम्स के कजिन भाई और 25 साल पहले गुजरात भाजपा के कद्दावर नेता। तब गुजरात के नए-नवेले मुख्यमंत्री बने एक नेता को यह भरोसा नहीं था कि वे अपनी लोकप्रियता के दम पर एक चुनाव जीत सकते हैं। इसलिए वे नेता गुजरात की सबसे सेफ सीट, अर्थात अहमदाबाद की एलिस ब्रिज सीट से चुनाव लड़ना चाहते थे, जो कि हरेन पंड्या की सीट थी। पंड्या को उस व्यक्ति के तौर-तरीके पसंद नहीं थे, तो सीट देने से मना कर दिया। अदावत की खाई गहरी हो गयी। 

तत्पश्चात गुजरात में भीषण दंगे हुए। आग लगाई किसी अन्य से, तपिश से झुलसे अन्य बेगुनाह लोग। हजारों की संख्या में लोग मरे, जिसमें मुख्य तादात मुस्लिमों की थी। क्रिया की प्रतिक्रिया के सिद्धान्त पर हजारों मासूमों की हत्या हरेन पंड्या के उसूलों में शामिल नहीं थी। कहते हैं कि दंगों की जांच कमेटी को पंड्या ने दंगों वाली रात से पहले मुख्यमंत्री आवास में हुई एक "गुप्त बैठक" के बारे में बता दिया था, जिसमें गुजरात के एक शीर्ष नेता ने पुलिस को निर्देश दिए थे कि हिंदुओं को अपनी भड़ास निकालने का पूरा मौका दिया जाए। कोई कार्यवाही नहीं करनी है। 
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कुछ समय बाद 26 मार्च, 2003 की सुबह लॉ गार्डन एरिया में हरेन पंड्या की गोलियों से भूनी हुई लाश उनकी कार में बरामद हुई। पंड्या के हत्यारे उनसे इस कदर घृणा करते थे कि हरेन को गुप्तांगों तक में गोली मारी गयी थी, अलबत्ता गाड़ी में खून का धब्बा तक न था। अनुमान है कि उन्हें अपहृत करने के बाद हत्या की गई और लाश गाड़ी में डंप कर दी गयी। 
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शुरुआती जांच के बाद असगर अली नामक एक शख्स को पंड्या की हत्या के इल्जाम में कुछ अन्य लोगों के साथ गिरफ्तार किया गया और सजा भी हुई। थ्योरी बनाई गई कि - मुस्लिमों ने गोधरा का बदला लेने के लिए पंड्या की हत्या कर दी। इस तरह पंड्या की चिता पर राजनीतिक लाभ की रोटियां सेकी गईं। 
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2011 में गुजरात हाईकोर्ट ने असगर अली तथा अन्य आरोपियों को बरी करते हुए पुलिस और सीबीआई को फटकार लगाते हुए केस को गुमराह करने का आरोप लगाया और कहा कि असगर अली के बहाने "असली आरोपी" को बचाने की साजिश की जा रही है। 
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गौरतलब है कि हाईकोर्ट के जजमेंट से सिर्फ 3-4 महीने पहले गुजरात के आईएएस अधिकारी संजीव भट्ट ने सुप्रीम कोर्ट ने एक हलफनामा देकर गुजरात दंगों के कुछ राज तो खोले ही थे, साथ में यह भी खुलासा किया था कि साबरमती जेल के इंचार्ज रहने के दौरान हरेन पंड्या के कत्ल की सजा काट रहे असगर अली ने उन्हें बताया था कि हरेन पंड्या की हत्या उसने नहीं की थी, उसे तो पीट-पीट कर इल्जाम कबूलने पर मजबूर किया गया था।
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बकौल असगर - वास्तव में उसे ये सुपारी मिली तो थी पर उसने इस काम को मना कर दिया था, जिस कारण बाद में तुलसीराम प्रजापति नामक व्यक्ति ने यह हत्या की थी, हत्या का आदेश सोहराबुद्दीन नामक एक गैंगस्टर ने दिया था और सोहराबुद्दीन को पंड्या की सुपारी देने वाला शख्स कोई और नहीं, बल्कि गुजरात के एक बड़े पुलिस अधिकारी "डीजी बंजारा" थे, जो गुजरात के दो शीर्ष नेताओं के सबसे खासमखास पुलिस अधिकारी थे। सोहराबुद्दीन के एक अन्य सहयोगी ने भी बाद में यह गवाही दी थी कि पंड्या की हत्या सोहराबुद्दीन ने डीजी बंजारा के कहने पर करवाई थी।
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काफी लोग जानते हैं कि सोहराबुद्दीन किन नेताओं के लिए वसूली रैकेट चलाता था और पॉलिटिकल मर्डर करता था। 2004 में जब केंद्र में सरकार बदली तो सोहराबुद्दीन के आकाओं को उससे खतरा प्रतीत होने लगा और उसे तथा उसके गुर्गे तुलसीराम को 2005 में ही इन्ही डीजी बंजारा के हाथों लश्कर का आतंकी बता कर एक एनकाउंटर में पहले ही निपटा दिया गया था। बची उसकी बीवी कौसर, जो कि गर्भवती थी, बलात्कार करने के बाद उसकी भी हत्या कर दी गयी। 
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इसी सोहराबुद्दीन के एनकाउंटर की जांच कर रहे थे जज लोया, जिन पर मैंने पहले ही दो पोस्टें की हैं। लोया की भी रहस्यमयी परिस्थितियों में केस का फैसला देने से पहले ही मौत हो गयी। लोया के दो राजदार दोस्त भी थे - खंडेलकर और थाम्ब्रे, जिसमें पहला एक बिल्डिंग से कूद कर मर गया और दूसरा चलती ट्रेन की ऊपरी बर्थ से गिर कर। बाकी बचे संजीव भट्ट, जिनके जैसा ईमानदार और कर्मठ अफसर भारत में होना मुश्किल है। जिस दिन उन्होंने कोर्ट में हलफनामा दिया, उसी शाम उन पर 30 साल पुराने फर्जी मामले को खोलकर सस्पेंड कर दिया गया, आज जेल में उम्रकैद की सजा काट रहे हैं। (संजीव जी पर विस्तृत चर्चा जल्द)
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2019 में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर के पूर्व में दोषी रहे लोगों की सजा बहाल करते हुए हरेन पंड्या के कत्ल का मामला हमेशा के लिए बंद कर दिया। साथ में यह भी बता दिया कि इस मामले में न्याय की बात करने वालों पर अब जुर्माना ठोका जाएगा। 
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बहरहाल, इस केस से जुड़ी हर जुबान तो खामोश हो गयी पर उस बाप की आवाज पर कौन रोक लगा सकता है, जिस पिता ने अपने बेटे हरेन की चिता पर हाजिरी लगाने आये लोगों में सिर्फ एक नेता को सार्वजनिक रूप से फटकार लगाई थी और कहा था कि...
चले जाओ यहां से। तुमने ही मेरे बेटे को मारा है।

Mr Hemraj Singh
साभार : एस के अहीर की पोस्ट (फेसबुक)


संत लालदास मध्यकालीन भारत के एक महान समाज सुधारक और लोक संत थे,

 

संत लालदास 

ध्यकालीन भारत के एक महान समाज सुधारक और लोक संत थे, जिन्होंने 
लालदासी संप्रदाय 

की स्थापना की। 
वे मुख्य रूप से राजस्थान के मेवात क्षेत्र (अलवर और भरतपुर) में हिंदू-मुस्लिम एकता और सांप्रदायिक सद्भाव के सबसे बड़े प्रतीक माने जाते हैं। [1]
उनके जीवन और विचारों से जुड़ी मुख्य बातें इस प्रकार है
1. जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि

  • जन्म: उनका जन्म 1540 ईस्वी में अलवर जिले के धोलीधूप गांव में हुआ था।
  • परिवार: वे मेव जाति (मुस्लिम) के एक गरीब परिवार में जन्मे थे। उनके पिता का नाम चांदमल और माता का नाम समदा था। [1, 2, 3, 4]
2. गुरु दीक्षा और साधना
  • आजीविका: उन्होंने अपना जीवन एक साधारण लकड़हारे के रूप में शुरू किया। वे जंगल से लकड़ियां काटकर बेचते थे।
  • गुरु: उन्होंने तिजारा के प्रसिद्ध सूफी संत गद्दन चिश्ती से दीक्षा ली और निर्गुण भक्ति का मार्ग अपनाया।
3. प्रमुख शिक्षाएं और दर्शन
  • निर्गुण राम की भक्ति: वे कबीर की तरह ईश्वर के निराकार रूप (राम) के उपासक थे। उन्होंने मूर्ति पूजा, अंधविश्वास और जातिगत भेदभाव का कड़ा विरोध किया। [1]
  • स्वावलंबन: उनका मानना था कि किसी भी साधु को भिक्षा नहीं मांगनी चाहिए। उन्होंने जीवनभर खुद मेहनत करके आजीविका कमाने का संदेश दिया।
  • सांप्रदायिक एकता: मेव समाज में जन्मे होने के कारण उनके उपदेशों में हिंदू और इस्लाम दोनों धर्मों की अच्छाइयों का मेल था। हिंदू उन्हें 'संत' और मुस्लिम उन्हें 'पीर' मानते हैं। [1]
4. संप्रदाय में दीक्षा की अनूठी परंपरा
लालदासी संप्रदाय में किसी नए व्यक्ति को शामिल करने की प्रक्रिया बेहद अनोखी है, जिसका उद्देश्य व्यक्ति के भीतर से अहंकार (घमंड) को पूरी तरह नष्ट करना होता है:
  • दीक्षा लेने वाले व्यक्ति का मुंह काला किया जाता है।
  • उसे जूतों की माला पहनाई जाती है।
  • इसके बाद उसे गधे पर उल्टा बिठाकर पूरे गांव में घुमाया जाता है और अंत में शरबत पिलाकर संप्रदाय में शामिल किया जाता है।
5. ग्रंथ और समाधि स्थल
  • ग्रंथ: उनके उपदेश मेवाती भाषा में संकलित हैं, जिन्हें 'लालदास जी की चेतावनियां' कहा जाता है।
  • महाप्रयाण: उनका निधन 1648 ईस्वी में भरतपुर के नगला जहाज गांव में हुआ था। उनकी मुख्य समाधि शेरपुर (अलवर) में है, जहां हर साल भव्य मेला लगता है। [1, 2]
यदि आप लालदासी संप्रदाय के विशेष नियमों, संत लालदास के चमत्कारों या मेवात के अन्य संतों के बारे में जानना चाहते हैं, तो मुझे बताएं।



 

रविवार, 12 जुलाई 2026

वरिष्ठ पत्रकार आरफा खानम शेरवानी हाल ही में ईरान की यात्रा से लौटी हैं,

वरिष्ठ पत्रकार आरफा खानम शेरवानी हाल ही में ईरान की यात्रा से लौटी हैं, जहाँ उन्होंने तेहरान और मशहद जैसे शहरों में ग्राउंड रिपोर्टिंग की और ईरानी समाज, राजनीति, महिलाओं के अधिकारों व हिजाब पर अपने अनुभव साझा किए। उनकी यात्रा और रिपोर्टिंग सोशल मीडिया पर व्यापक चर्चा और बहस का विषय रही है।उनकी यात्रा के मुख्य आकर्षण और अनुभव इस प्रकार हैं:ग्राउंड रिपोर्टिंग और अनुभव: उन्होंने ईरान के लोगों की ज़िंदगी, वहाँ के राजनीतिक माहौल और आम जनजीवन को करीब से कवर किया। मशहद में उनके द्वारा किए गए कवरेज और लोगों की भावनाओं पर उनकी टिप्पणियों ने काफी ध्यान खींचा।ईरानी मीडिया द्वारा इंटरव्यू: आरफा खानम शेरवानी ने साझा किया कि उनकी ग्राउंड रिपोर्टिंग से प्रभावित होकर ईरानी मीडिया ने खुद उनसे संपर्क किया और उनका इंटरव्यू लिया, जो उनके लिए एक दिलचस्प अनुभव रहा।सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाएं: उनकी यात्रा को लेकर सोशल मीडिया पर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं। कुछ यूजर्स ने उनकी रिपोर्टिंग की तारीफ की है, वहीं उनके बयानों और यात्रा को लेकर कुछ लोगों द्वारा तीखी आलोचना और सवाल भी उठाए गए हैं।'Ask Me Anything' सत्र: ईरान से लौटने के बाद, उन्होंने अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से एक 'Ask Me Anything' सत्र आयोजित किया, जिसमें उन्होंने ईरानी समाज, संस्कृति, हिजाब के नियमों और प्रतिबंधों जैसे विषयों पर दर्शकों के सवालों के जवाब दिए।