सोमवार, 12 अक्टूबर 2026

मोदी शाह के डर को समझना है तो आरएसएस को समझिए. - विनोद वर्मा

मोदी शाह के डर को समझना है तो आरएसएस को समझिए.
विनोद वर्मा 
वरिष्ठ पत्रकार (बीबीसी, अमर उजाला, देशबंधु आदि )
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मोदी शाह के डर को समझना है तो आरएसएस को समझिए.
पहले समझना होगा कि क्यों भाजपा की केंद्र की सरकार शांतिपूर्ण आंदोलनों को कुचल देना चाहती है.
जब जंतर मंतर पर अन्ना हज़ारे का आंदोलन हुआ तो केंद्र में सत्तारूढ़ यूपीए की सरकार को कोई आपत्ति नहीं हुई.
कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार ने अरविंद केजरीवाल का मुखौटा लगाए इस आंदोलन को नहीं रोका. यह पता चल जाने के बावजूद कि इस आंदोलन के पीछे संघ का हाथ है.
लेकिन भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार को आंदोलनों से दिक्कत है.
इस दिक्कत को समझना कठिन नहीं है बशर्ते आप सही सिरा पकड़ लें.
सही सिरा भाजपा को समझने से नहीं मिलेगा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का डर समझने से भी नहीं मिलेगा और न केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह का चाल चरित्र और चेहरा समझने से मिलेगा.
यह मिलेगा आरएसएस को, आंदोलनों और संघर्षों को लेकर उसकी सोच को समझने से.
चलिए समझने की कोशिश करते हैं.
दिल्ली इन दिनों आंदोलनरत है. कुछ दिनों की चुप्पी को छोड़ दें तो गत 20 जुलाई से संघर्ष देखने को मिल रहा है.
पहले पेपर लीक के ख़िलाफ़ शिक्षा मंत्री का इस्तीफ़ा मांगने का आंदोलन था.
इस्तीफ़ा हो गया.
अब वोट चोरी के ख़िलाफ़ मुख्य चुनाव आयुक्त से इस्तीफ़ा मांगने के लिए आंदोलन चल रहे हैं.
दो अक्टूबर से तो लगातार सड़कों पर आंदोलन चल रहा है.
कभी नेता प्रतिपक्ष के नेतृत्व में विपक्ष के 300 सांसद चुनाव आयुक्तों से मिलने निकल पड़े तो अगले दिन विपक्ष के नेता फिर सड़कों पर आ गए.
10 अक्टूबर को घोषणा के मुताबिक सीजेपी का धरना प्रदर्शन होना था. इसमें दूसरे छात्र संगठन जैसे आइसा और एसएफ़आई भी शामिल थे.
** आंदोलनों पर प्रतिक्रिया **
20 जुलाई को दिल्ली की पुलिस और दिल्ली पुलिस के संरक्षण में कुछ अज्ञात अनाम लोगों ने छात्रों को दौड़ा दौड़ाकर पीटा, लड़कियों से अभद्रता हुई, अश्रुगैस छोड़ा गया, पैलेटगन तक चलाई गई. कुल मिलाकर आंदोलन को सुरक्षाबलों के हाथों कुचलने की कोशिश हुई.
जितनी कोशिश हुई, उसकी प्रतिक्रिया उससे भी बड़ी हो गई. आख़िर सरकार को झुकना पड़ा. शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफ़ा देना पड़ा.
फिर इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कलई खोल दी. इस रिपोर्ट से उनके ख़िलाफ़ कांग्रेस नेता राहुल गांधी के वोट चारी के आरोपों की पुष्टि हो गई.
इसके बाद ज्ञानेश कुमार का इस्तीफ़ा मांगने के लिए आंदोलन शुरु हो गए.
पूरी दिल्ली छावनी में बदल दी गई. कहते हैं कि एक लाख जवान दिल्ली में तैनात कर दिए गए. फिर भी युवा रुके नहीं.
57 मेट्रो बंद, 200 ट्रेनों को दिल्ली आने से रोक दिया गया. सेंट्रल दिल्ली को बैरीकेड्स से सील कर दिया गया. फिर भी सात हज़ार हिरासत में लिए गए.
12 अक्टूबर को एक बार फिर कांग्रेस सड़कों पर उतरने वाली है.
चाहे वो सांसद हों, विपक्ष के नेता हों या फिर सीजेपी और छात्र संगठन के सदस्य. भाजपा सरकार को कुछ भी मंज़ूर नहीं.
‘आंदोलनजीवी’ जैसे शब्दों से आंदोलनकारियों पर तंज़ करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके गृहमंत्री अमित शाह, दोनों ही, ऐसा लगता है कि दहशत में हैं.
तो सवाल यह है कि ये लोग इतना डरते क्यों हैं?
इसकी जड़ें तलाशने के लिए या इसका सही सिरा पड़कने के लिए आपको चलना पड़ेगा आज़ादी के आंदोलन तक.
** गुरु गोलवलकर से माफ़ीवीर सावरकर तक **
आज़ादी के मुख्य रूप से तीन बड़े आंदोलन हुए.
1. असहयोग आंदोलन (1920-22)
2. सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930-34)
3. भारत छोड़ो आंदोलन (1942)
अब इन तीनों आंदोलनों में आरएसएस की भूमिका पर बात करते हैं.
असहयोग आंदोलन के समय तो आरएसएस का गठन नहीं हुआ था. तो उस समय केशव बलिराम हेडगेवार कांग्रेस में थे. उन्होंने इस आंदोलन में भाग लिया पर हिंदू संगठनों से जुड़ और प्रमुख लोग दूर ही रहे.
बाद में गोलवलकर ने असहयोग आंदोलन में युवाओं की भूमिका पर बात करते हुए कहा कि इस तरह से आंदोलनों से ‘अनुशासनहीनता आती है और युवाओं के मन में क़ानून के प्रति आस्था कम होती है.’ ज़ाहिर है वे युवाओं के ब्रिटिश सरकार और क़ानून के ख़िलाफ़ हो जाने का ज़िक्र कर रहे थे.
सविनय अवज्ञा आंदोलन के समय लोग तत्कालीन संघ प्रमुख हेडगेवार के पास गए तो उन्होंने साफ़ कह दिया कि संघ एक संगठन के रूप में इस आंदोलन में हिस्सा नहीं लेगा.
कुछ दबाव बढ़ा तो संघ से इस्तीफ़ा देकर हेडगेवार व्यक्तिगत तौर पर जेल तो गए. लेकिन बाहर आकर कहा कि वे जेल में बंद युवाओं को संघ के बारे में समझाने गए थे.
भारत छोड़ो आंदोलन में भी संघ का यही रवैया रहा.
तब के सरसंघचालक एम.एस. गोलवलकर के नेतृत्व में आरएसएस ने संगठनात्मक रूप से इस आंदोलन में भाग न लेने का फैसला किया.
‘श्री गुरुजी समग्र दर्शन’ के अनुसार गोलवलकर ने ख़ुद लिखा है, “1942 में भी अनेकों के मन में तीव्र आंदोलन था लेकिन उस समय भी संघ का नित्य कार्य चलता रहा. संघ ने प्रत्यक्ष रूप से कुछ न करने का संकल्प लिया.”
स्वयंसेवकों को कांग्रेस के आंदोलनों से दूर रहने की हिदायत दी गई थी.
गोलवलकर ने माना कि बहुत से लोग संघ को ‘निष्क्रिय लोगों का संगठन’ मानने लगे थे और इनमें संघ के सदस्य भी थे.
लेकिन संघ ने अपने विचार नहीं बदले. वह आज़ादी की लड़ाई से दूर रहा.
तभी तो ब्रिटिश खुफिया और बॉम्बे होम डिपार्टमेंट की रिपोर्टें स्पष्ट कहती हैं कि आरएसएस ने “कानून के दायरे में रहकर काम किया और अगस्त 1942 की अशांति में भाग नहीं लिया.” 
सार संक्षेप में कहें तो आरएसएस का मूल चरित्र आंदोलनों से दूर रहने का है. उसके डीएनए में कायरता है. डर है. भय है.
जिसे वे वीर कहते हैं उस सावरकर के माफ़ीनामे और आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी को लिखे तत्कालीन सरसंघचालक बालासाहेब देवरस पत्र गवाह हैं कि इनको जेल जाने से भयानक किस्म का डर लगता है.
इसलिए जब ‘आंदोलनजीवी’ शब्द आते हैं तो आपको समझना चाहिए कि यह आरएसएस के पूर्व प्रचारक के ही उद्गार हैं, देश के प्रधानमंत्री के नहीं.
अमित शाह यदि दिल्ली में आंदोलनों को कुचलना चाहते हैं तो इस फ़ैसले के पीछे केंद्रीय गृहमंत्री कम, आरएसएस की शाखा से निकला भाजपा कार्यकर्ता ज़्यादा है.
वे आंदोलनों और संघर्षों से डरते हैं.
और मानते हैं कि आंदोलन लोगों की सोच को भ्रष्ट कर देते हैं. उनके गुरु गोलवलकर ऐसा ही बता गए हैं.
तो आप जब भी सरकार के चेहरे पर डर पढ़ें तो समझ लीजिएगा कि इसका सिरा आरएसएस से जुड़ा है.
वे डरे हुए लोग हैं. कायर हैं.
आप संविधान की लाख दुहाई देते रहिए, वे तो संविधान को मानते ही नहीं तो सम्मान काहे का?
न आरएसएस लोकतंत्र के पक्ष में रहा है. तो भाड़ में जाए लोकतंत्र, आरएसएस की बला से.
देश हमारा है, संविधान हमारा है, हम लोकतंत्र चाहते थे. तो हमें ही इसे बचाना होगा.
और पहले आरएसएस के हाथों से बचाना है. 

रविवार, 9 अगस्त 2026

2014 के बाद से भारतीय राजनीती में क्या क्या बदलाव हुआ है ?


 2014 के बाद भारतीय राजनीति में सबसे बड़ा बदलाव 

भाजपा का उदय और नरेंद्र मोदी का नेतृत्व रहा है। 
कांग्रेस का प्रभुत्व घटा, भाजपा ने केंद्र और राज्यों में अपना विस्तार किया, साथ ही कई बड़े नीतिगत फैसले जैसे नोटबंदी, GST, CAA और डिजिटल इंडिया ने राजनीति और शासन की दिशा बदल दी।**  
राजनीतिक बदलाव :
भाजपा का उदय:** 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने कांग्रेस की 10 साल की सत्ता समाप्त की। इसके बाद भाजपा ने केंद्र और 19 राज्यों व 2 केंद्रशासित प्रदेशों में शासन स्थापित किया।
कांग्रेस का पतन:** कांग्रेस अब मुख्य विपक्षी दल रह गई, लेकिन उसका जनाधार लगातार कमजोर हुआ।  
नई संसद भवन:** 2023 में नया संसद भवन उद्घाटित हुआ, जो भारतीय विरासत और आधुनिकता का प्रतीक माना गया।
प्रमुख नीतिगत फैसले
नोटबंदी (2016):** काले धन और नकली नोटों पर रोक लगाने के लिए ₹500 और ₹1000 के नोट बंद किए गए।  
GST (2017):** पूरे देश में एकीकृत कर प्रणाली लागू हुई।  
CAA (2019):** नागरिकता संशोधन अधिनियम ने व्यापक विरोध और बहस को जन्म दिया।
कृषि कानून (2020):** किसानों के विरोध के बाद 2021 में वापस ले लिए गए। 
शासन और प्रशासन
डिजिटल इंडिया:** ई-गवर्नेंस, आधार आधारित सेवाएं और डिजिटल भुगतान को बढ़ावा मिला। 
Minimum Government, Maximum Governance’:** 
नौकरशाही को कम कर नागरिक-केंद्रित नीतियों पर जोर दिया गया। 
महिला सशक्तिकरण:** 
उज्ज्वला योजना जैसी योजनाओं से महिलाओं को लाभ मिला।  
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर
भारत की वैश्विक पहचान:** मोदी सरकार ने विदेश नीति में सक्रिय भूमिका निभाई, G20 की अध्यक्षता और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की स्थिति मजबूत हुई। 
आर्थिक शक्ति:** भारत अब दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है। 
चुनौतियाँ और विवाद
संस्थागत केंद्रीकरण:** सत्ता का केंद्रीकरण और विपक्ष की भूमिका पर सवाल उठे। 
जन आंदोलनों का दबाव:** कई बार सरकार को विरोध के चलते नीतियों में बदलाव करना पड़ा, जैसे भूमि अधिग्रहण बिल और कृषि कानून। 
संक्षेप में, 2014 के बाद भारतीय राजनीति में **भाजपा का प्रभुत्व, बड़े नीतिगत बदलाव, डिजिटल शासन और वैश्विक स्तर पर भारत की बढ़ती ताकत** सबसे अहम परिवर्तन रहे हैं। क्या आप चाहेंगे कि मैं इन बदलावों को सकारात्मक और नकारात्मक प्रभावों** के आधार पर एक तुलना तालिका में प्रस्तुत करूँ?

मोदी के सलाहकार और संविधान ?
आपका सवाल दो हिस्सों में बंटा है – 
मोदी के सलाहकार
और संविधान।  

मोदी के सलाहकार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास औपचारिक रूप से "प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO)" और नीति आयोग जैसी संस्थाएँ हैं, जो उन्हें सलाह देती हैं।  
प्रधान सचिव:** पीएमओ में प्रधान सचिव (जैसे नृपेंद्र मिश्रा, फिर पी.के. मिश्रा) मोदी के प्रमुख प्रशासनिक सलाहकार रहे हैं।  
नीति आयोग:** योजना आयोग को समाप्त कर 2015 में नीति आयोग बनाया गया, जो आर्थिक और सामाजिक नीतियों पर सलाह देता है।  
विशेषज्ञ सलाहकार:** अर्थशास्त्र, विदेश नीति, टेक्नोलॉजी और सुरक्षा मामलों में मोदी ने कई विशेषज्ञों और थिंक टैंकों से राय ली है।  
राजनीतिक सलाहकार:** भाजपा संगठन और आरएसएस भी राजनीतिक दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं।  


संविधान और मोदी सरकार :
संविधान भारत की सर्वोच्च विधिक रूपरेखा है। मोदी सरकार ने कई बार संविधान का हवाला देकर बड़े फैसले किए हैं:  

अनुच्छेद 370 हटाना (2019):** जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाला अनुच्छेद हटाया गया।  
GST लागू करना (2017):** संविधान संशोधन के जरिए पूरे देश में एक कर व्यवस्था बनाई गई।  
CAA (2019):** नागरिकता संशोधन अधिनियम लाया गया, जिस पर संविधान की मूल भावना और समानता को लेकर बहस हुई।  
संविधान दिवस (26 नवंबर):** मोदी सरकार ने संविधान दिवस को अधिक महत्व दिया और इसे व्यापक रूप से मनाना शुरू किया।  

संक्षेप में, मोदी के सलाहकारों में **PMO, नीति आयोग, विशेषज्ञ और संगठनात्मक नेतृत्व** शामिल हैं, जबकि संविधान के संदर्भ में उनकी सरकार ने कई ऐतिहासिक संशोधन और फैसले किए हैं।  

क्या आप चाहेंगे कि मैं इन फैसलों को **संविधानिक दृष्टिकोण से – कौन से फैसले संविधान की मूल भावना के अनुरूप थे और कौन से विवादित रहे –** एक तालिका में समझाऊँ?

अमित शाह की भूमिका ?
अमित शाह की भूमिका भारतीय राजनीति में 2014 के बाद से बेहद निर्णायक रही है।  

राजनीतिक रणनीतिकार
चुनावी प्रबंधन :
अमित शाह को भाजपा का "चाणक्य" कहा जाता है। 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने उत्तर प्रदेश का चुनावी प्रबंधन किया, जिससे भाजपा को ऐतिहासिक जीत मिली।  
भाजपा अध्यक्ष (2014–2019):
इस दौरान उन्होंने संगठन को मज़बूत किया, बूथ स्तर तक पार्टी का विस्तार किया और भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर सबसे बड़ी पार्टी बना दिया।  
राज्य चुनावों में सफलता :
उनके नेतृत्व में भाजपा ने हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड, असम, उत्तराखंड, त्रिपुरा और कई अन्य राज्यों में सरकार बनाई।  

सरकार में भूमिका
गृहमंत्री (2019 से) : 
अनुच्छेद 370 हटाना:** जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त करने का ऐतिहासिक निर्णय उनके मंत्रालय से आया।  
  CAA (2019):** नागरिकता संशोधन अधिनियम को संसद में प्रस्तुत और पारित कराने में अहम भूमिका निभाई।  
  आंतरिक सुरक्षा:** आतंकवाद, नक्सलवाद और सीमा सुरक्षा पर सख्त नीतियाँ अपनाईं।  
  कानून व्यवस्था:** पुलिस सुधार और केंद्रीय एजेंसियों की भूमिका को मज़बूत किया।  

संगठन और मोदी के साथ तालमेल
- अमित शाह को नरेंद्र मोदी का सबसे भरोसेमंद सहयोगी माना जाता है।  
- गुजरात से लेकर केंद्र तक, दोनों की जोड़ी ने भाजपा को एक अनुशासित और चुनावी मशीन में बदल दिया।  
- शाह का संगठनात्मक कौशल और मोदी का जन-नेतृत्व मिलकर भाजपा की राजनीति की रीढ़ बने।  

संक्षेप में, अमित शाह की भूमिका **चुनावी रणनीतिकार, संगठन निर्माता और गृहमंत्री के रूप में नीति-निर्माता** की रही है।  

भारतीय संविधान के खिलाफ भाजपा सरकार के कार्य ?
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार के कार्यों और नीतियों को लेकर विपक्षी दलों, नागरिक समाज और कानूनी विशेषज्ञों द्वारा समय-समय पर संविधान के सिद्धांतों के उल्लंघन के आरोप लगाए गए हैं। हालांकि, सरकार और उसके समर्थक इन सभी कदमों को संवैधानिक दायरे में, देश की प्रगति और सुरक्षा के लिए उठाया गया कदम बताते हैं।इस विषय पर दोनों पक्षों के मुख्य तर्क और दृष्टिकोण नीचे दिए गए हैं:विपक्ष और आलोचकों के मुख्य आरोपविपक्ष और नागरिक समाज के अनुसार भाजपा सरकार के निम्नलिखित कार्यों से संवैधानिक ढांचा प्रभावित हुआ है:स्वायत्त संस्थाओं पर प्रभाव: प्रवर्तन निदेशालय (ED), सीबीआई (CBI) और चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक व स्वायत्त संस्थाओं के कथित राजनीतिक दुरुपयोग का आरोप। विपक्ष का कहना है कि इनका इस्तेमाल विरोधी नेताओं को निशाना बनाने के लिए किया जाता है।संघवाद (Federalism) को कमजोर करना: राज्य सरकारों और राज्यपालों के बीच बढ़ते विवादों को लेकर आरोप हैं कि केंद्र सरकार राज्यों के अधिकारों में हस्तक्षेप कर रही है। विपक्ष इसे 'सहकारी संघवाद' की भावना के खिलाफ मानता है।अनुच्छेद 370 को हटाना: जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को समाप्त करने और राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित करने के तरीके को आलोचकों ने स्थानीय जनता और विधानसभा की सहमति के बिना किया गया निर्णय बताया।नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA): इस कानून को आलोचकों द्वारा संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और धर्मनिरपेक्षता (Secularism) के मूल सिद्धांतों के विपरीत माना गया।अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश: असहमति जताने वाले पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विपक्षी नेताओं पर कड़े कानून (जैसे UAPA) लगाने को मौलिक अधिकारों का हनन बताया गया।संसदीय प्रक्रियाओं की अनदेखी: कई महत्वपूर्ण विधेयकों (जैसे कृषि कानून) को बिना विस्तृत संसदीय चर्चा या स्थायी समितियों (Standing Committees) को भेजे बिना पास कराने के आरोप लगे।सरकार और समर्थकों का पक्षभाजपा सरकार और उसके समर्थक इन सभी आरोपों को खारिज करते हुए तर्क देते हैं कि उनके सभी कार्य संविधान के दायरे में और राष्ट्रहित में हैं:संविधान की सुरक्षा का संकल्प: भाजपा का कहना है कि सरकार डॉ. बी.आर. अंबेडकर द्वारा बनाए गए संविधान की सुरक्षा और उसके गौरव को बढ़ाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। सरकार द्वारा 'संविधान दिवस' मनाना इसकी एक मिसाल है।एक राष्ट्र, एक संविधान: अनुच्छेद 370 को हटाना पूरे भारत में एक समान संवैधानिक व्यवस्था लागू करने के लिए आवश्यक था, जिससे जम्मू-कश्मीर के नागरिकों को भी भारत के सभी संवैधानिक अधिकार और आरक्षण का लाभ मिल सका।संवैधानिक प्रक्रियाओं का पालन: सरकार के अनुसार, संसद द्वारा पारित सभी कानून (जैसे CAA या कृषि कानून) पूरी तरह लोकतांत्रिक और संवैधानिक प्रक्रिया के तहत बहुमत से पारित किए गए हैं।भ्रष्टाचार पर कानूनी कार्रवाई: जांच एजेंसियों (ED/CBI) की कार्रवाई पर सरकार का कहना है कि वे बिना किसी राजनीतिक भेदभाव के केवल भ्रष्टाचार के खिलाफ कानून सम्मत काम कर रही हैं।न्यायालयों का फैसला: सरकार का तर्क है कि उसके अधिकांश बड़े फैसलों (जैसे अनुच्छेद 370 हटाना, नोटबंदी, और ईडब्ल्यूएस आरक्षण) को देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) ने भी संवैधानिक और वैध ठहराया है। 

सोमवार, 13 जुलाई 2026

चले जाओ यहां से तुमने ही मेरे बेटे को मारा है।

  नीच और तड़ीपार है तो मुमकिन है 


नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री की कुर्सी ऐसे ही छोड़ देगा? मौत का सौदागर है खून की नदियां बह जाएगी और कुर्सी नहीं छोड़ेगा।

एक थे हरेन पंड्या, अस्ट्रॉनॉट सुनीता विलियम्स के कजिन भाई और 25 साल पहले गुजरात भाजपा के कद्दावर नेता। तब गुजरात के नए-नवेले मुख्यमंत्री बने एक नेता को यह भरोसा नहीं था कि वे अपनी लोकप्रियता के दम पर एक चुनाव जीत सकते हैं। इसलिए वे नेता गुजरात की सबसे सेफ सीट, अर्थात अहमदाबाद की एलिस ब्रिज सीट से चुनाव लड़ना चाहते थे, जो कि हरेन पंड्या की सीट थी। पंड्या को उस व्यक्ति के तौर-तरीके पसंद नहीं थे, तो सीट देने से मना कर दिया। अदावत की खाई गहरी हो गयी। 

तत्पश्चात गुजरात में भीषण दंगे हुए। आग लगाई किसी अन्य से, तपिश से झुलसे अन्य बेगुनाह लोग। हजारों की संख्या में लोग मरे, जिसमें मुख्य तादात मुस्लिमों की थी। क्रिया की प्रतिक्रिया के सिद्धान्त पर हजारों मासूमों की हत्या हरेन पंड्या के उसूलों में शामिल नहीं थी। कहते हैं कि दंगों की जांच कमेटी को पंड्या ने दंगों वाली रात से पहले मुख्यमंत्री आवास में हुई एक "गुप्त बैठक" के बारे में बता दिया था, जिसमें गुजरात के एक शीर्ष नेता ने पुलिस को निर्देश दिए थे कि हिंदुओं को अपनी भड़ास निकालने का पूरा मौका दिया जाए। कोई कार्यवाही नहीं करनी है। 
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कुछ समय बाद 26 मार्च, 2003 की सुबह लॉ गार्डन एरिया में हरेन पंड्या की गोलियों से भूनी हुई लाश उनकी कार में बरामद हुई। पंड्या के हत्यारे उनसे इस कदर घृणा करते थे कि हरेन को गुप्तांगों तक में गोली मारी गयी थी, अलबत्ता गाड़ी में खून का धब्बा तक न था। अनुमान है कि उन्हें अपहृत करने के बाद हत्या की गई और लाश गाड़ी में डंप कर दी गयी। 
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शुरुआती जांच के बाद असगर अली नामक एक शख्स को पंड्या की हत्या के इल्जाम में कुछ अन्य लोगों के साथ गिरफ्तार किया गया और सजा भी हुई। थ्योरी बनाई गई कि - मुस्लिमों ने गोधरा का बदला लेने के लिए पंड्या की हत्या कर दी। इस तरह पंड्या की चिता पर राजनीतिक लाभ की रोटियां सेकी गईं। 
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2011 में गुजरात हाईकोर्ट ने असगर अली तथा अन्य आरोपियों को बरी करते हुए पुलिस और सीबीआई को फटकार लगाते हुए केस को गुमराह करने का आरोप लगाया और कहा कि असगर अली के बहाने "असली आरोपी" को बचाने की साजिश की जा रही है। 
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गौरतलब है कि हाईकोर्ट के जजमेंट से सिर्फ 3-4 महीने पहले गुजरात के आईएएस अधिकारी संजीव भट्ट ने सुप्रीम कोर्ट ने एक हलफनामा देकर गुजरात दंगों के कुछ राज तो खोले ही थे, साथ में यह भी खुलासा किया था कि साबरमती जेल के इंचार्ज रहने के दौरान हरेन पंड्या के कत्ल की सजा काट रहे असगर अली ने उन्हें बताया था कि हरेन पंड्या की हत्या उसने नहीं की थी, उसे तो पीट-पीट कर इल्जाम कबूलने पर मजबूर किया गया था।
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बकौल असगर - वास्तव में उसे ये सुपारी मिली तो थी पर उसने इस काम को मना कर दिया था, जिस कारण बाद में तुलसीराम प्रजापति नामक व्यक्ति ने यह हत्या की थी, हत्या का आदेश सोहराबुद्दीन नामक एक गैंगस्टर ने दिया था और सोहराबुद्दीन को पंड्या की सुपारी देने वाला शख्स कोई और नहीं, बल्कि गुजरात के एक बड़े पुलिस अधिकारी "डीजी बंजारा" थे, जो गुजरात के दो शीर्ष नेताओं के सबसे खासमखास पुलिस अधिकारी थे। सोहराबुद्दीन के एक अन्य सहयोगी ने भी बाद में यह गवाही दी थी कि पंड्या की हत्या सोहराबुद्दीन ने डीजी बंजारा के कहने पर करवाई थी।
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काफी लोग जानते हैं कि सोहराबुद्दीन किन नेताओं के लिए वसूली रैकेट चलाता था और पॉलिटिकल मर्डर करता था। 2004 में जब केंद्र में सरकार बदली तो सोहराबुद्दीन के आकाओं को उससे खतरा प्रतीत होने लगा और उसे तथा उसके गुर्गे तुलसीराम को 2005 में ही इन्ही डीजी बंजारा के हाथों लश्कर का आतंकी बता कर एक एनकाउंटर में पहले ही निपटा दिया गया था। बची उसकी बीवी कौसर, जो कि गर्भवती थी, बलात्कार करने के बाद उसकी भी हत्या कर दी गयी। 
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इसी सोहराबुद्दीन के एनकाउंटर की जांच कर रहे थे जज लोया, जिन पर मैंने पहले ही दो पोस्टें की हैं। लोया की भी रहस्यमयी परिस्थितियों में केस का फैसला देने से पहले ही मौत हो गयी। लोया के दो राजदार दोस्त भी थे - खंडेलकर और थाम्ब्रे, जिसमें पहला एक बिल्डिंग से कूद कर मर गया और दूसरा चलती ट्रेन की ऊपरी बर्थ से गिर कर। बाकी बचे संजीव भट्ट, जिनके जैसा ईमानदार और कर्मठ अफसर भारत में होना मुश्किल है। जिस दिन उन्होंने कोर्ट में हलफनामा दिया, उसी शाम उन पर 30 साल पुराने फर्जी मामले को खोलकर सस्पेंड कर दिया गया, आज जेल में उम्रकैद की सजा काट रहे हैं। (संजीव जी पर विस्तृत चर्चा जल्द)
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2019 में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर के पूर्व में दोषी रहे लोगों की सजा बहाल करते हुए हरेन पंड्या के कत्ल का मामला हमेशा के लिए बंद कर दिया। साथ में यह भी बता दिया कि इस मामले में न्याय की बात करने वालों पर अब जुर्माना ठोका जाएगा। 
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बहरहाल, इस केस से जुड़ी हर जुबान तो खामोश हो गयी पर उस बाप की आवाज पर कौन रोक लगा सकता है, जिस पिता ने अपने बेटे हरेन की चिता पर हाजिरी लगाने आये लोगों में सिर्फ एक नेता को सार्वजनिक रूप से फटकार लगाई थी और कहा था कि...
चले जाओ यहां से। तुमने ही मेरे बेटे को मारा है।

Mr Hemraj Singh
साभार : एस के अहीर की पोस्ट (फेसबुक)


संत लालदास मध्यकालीन भारत के एक महान समाज सुधारक और लोक संत थे,

 

संत लालदास 

मध्यकालीन भारत के एक महान समाज सुधारक और लोक संत थे, जिन्होंने 
लालदासी संप्रदाय 

की स्थापना की। 
वे मुख्य रूप से राजस्थान के मेवात क्षेत्र (अलवर और भरतपुर) में हिंदू-मुस्लिम एकता और सांप्रदायिक सद्भाव के सबसे बड़े प्रतीक माने जाते हैं। [1]
उनके जीवन और विचारों से जुड़ी मुख्य बातें इस प्रकार है
1. जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि

  • जन्म: उनका जन्म 1540 ईस्वी में अलवर जिले के धोलीधूप गांव में हुआ था।
  • परिवार: वे मेव जाति (मुस्लिम) के एक गरीब परिवार में जन्मे थे। उनके पिता का नाम चांदमल और माता का नाम समदा था। [1, 2, 3, 4]
2. गुरु दीक्षा और साधना
  • आजीविका: उन्होंने अपना जीवन एक साधारण लकड़हारे के रूप में शुरू किया। वे जंगल से लकड़ियां काटकर बेचते थे।
  • गुरु: उन्होंने तिजारा के प्रसिद्ध सूफी संत गद्दन चिश्ती से दीक्षा ली और निर्गुण भक्ति का मार्ग अपनाया।
3. प्रमुख शिक्षाएं और दर्शन
  • निर्गुण राम की भक्ति: वे कबीर की तरह ईश्वर के निराकार रूप (राम) के उपासक थे। उन्होंने मूर्ति पूजा, अंधविश्वास और जातिगत भेदभाव का कड़ा विरोध किया। [1]
  • स्वावलंबन: उनका मानना था कि किसी भी साधु को भिक्षा नहीं मांगनी चाहिए। उन्होंने जीवनभर खुद मेहनत करके आजीविका कमाने का संदेश दिया।
  • सांप्रदायिक एकता: मेव समाज में जन्मे होने के कारण उनके उपदेशों में हिंदू और इस्लाम दोनों धर्मों की अच्छाइयों का मेल था। हिंदू उन्हें 'संत' और मुस्लिम उन्हें 'पीर' मानते हैं। [1]
4. संप्रदाय में दीक्षा की अनूठी परंपरा
लालदासी संप्रदाय में किसी नए व्यक्ति को शामिल करने की प्रक्रिया बेहद अनोखी है, जिसका उद्देश्य व्यक्ति के भीतर से अहंकार (घमंड) को पूरी तरह नष्ट करना होता है:
  • दीक्षा लेने वाले व्यक्ति का मुंह काला किया जाता है।
  • उसे जूतों की माला पहनाई जाती है।
  • इसके बाद उसे गधे पर उल्टा बिठाकर पूरे गांव में घुमाया जाता है और अंत में शरबत पिलाकर संप्रदाय में शामिल किया जाता है।
5. ग्रंथ और समाधि स्थल
  • ग्रंथ: उनके उपदेश मेवाती भाषा में संकलित हैं, जिन्हें 'लालदास जी की चेतावनियां' कहा जाता है।
  • महाप्रयाण: उनका निधन 1648 ईस्वी में भरतपुर के नगला जहाज गांव में हुआ था। उनकी मुख्य समाधि शेरपुर (अलवर) में है, जहां हर साल भव्य मेला लगता है। [1, 2]
यदि आप लालदासी संप्रदाय के विशेष नियमों, संत लालदास के चमत्कारों या मेवात के अन्य संतों के बारे में जानना चाहते हैं, तो मुझे बताएं।



 

रविवार, 12 जुलाई 2026

वरिष्ठ पत्रकार आरफा खानम शेरवानी हाल ही में ईरान की यात्रा से लौटी हैं,

वरिष्ठ पत्रकार आरफा खानम शेरवानी हाल ही में ईरान की यात्रा से लौटी हैं, जहाँ उन्होंने तेहरान और मशहद जैसे शहरों में ग्राउंड रिपोर्टिंग की और ईरानी समाज, राजनीति, महिलाओं के अधिकारों व हिजाब पर अपने अनुभव साझा किए। उनकी यात्रा और रिपोर्टिंग सोशल मीडिया पर व्यापक चर्चा और बहस का विषय रही है।उनकी यात्रा के मुख्य आकर्षण और अनुभव इस प्रकार हैं:ग्राउंड रिपोर्टिंग और अनुभव: उन्होंने ईरान के लोगों की ज़िंदगी, वहाँ के राजनीतिक माहौल और आम जनजीवन को करीब से कवर किया। मशहद में उनके द्वारा किए गए कवरेज और लोगों की भावनाओं पर उनकी टिप्पणियों ने काफी ध्यान खींचा।ईरानी मीडिया द्वारा इंटरव्यू: आरफा खानम शेरवानी ने साझा किया कि उनकी ग्राउंड रिपोर्टिंग से प्रभावित होकर ईरानी मीडिया ने खुद उनसे संपर्क किया और उनका इंटरव्यू लिया, जो उनके लिए एक दिलचस्प अनुभव रहा।सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाएं: उनकी यात्रा को लेकर सोशल मीडिया पर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं। कुछ यूजर्स ने उनकी रिपोर्टिंग की तारीफ की है, वहीं उनके बयानों और यात्रा को लेकर कुछ लोगों द्वारा तीखी आलोचना और सवाल भी उठाए गए हैं।'Ask Me Anything' सत्र: ईरान से लौटने के बाद, उन्होंने अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से एक 'Ask Me Anything' सत्र आयोजित किया, जिसमें उन्होंने ईरानी समाज, संस्कृति, हिजाब के नियमों और प्रतिबंधों जैसे विषयों पर दर्शकों के सवालों के जवाब दिए।