सोमवार, 12 अक्टूबर 2026

मोदी शाह के डर को समझना है तो आरएसएस को समझिए. - विनोद वर्मा

मोदी शाह के डर को समझना है तो आरएसएस को समझिए.
विनोद वर्मा 
वरिष्ठ पत्रकार (बीबीसी, अमर उजाला, देशबंधु आदि )
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मोदी शाह के डर को समझना है तो आरएसएस को समझिए.
पहले समझना होगा कि क्यों भाजपा की केंद्र की सरकार शांतिपूर्ण आंदोलनों को कुचल देना चाहती है.
जब जंतर मंतर पर अन्ना हज़ारे का आंदोलन हुआ तो केंद्र में सत्तारूढ़ यूपीए की सरकार को कोई आपत्ति नहीं हुई.
कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार ने अरविंद केजरीवाल का मुखौटा लगाए इस आंदोलन को नहीं रोका. यह पता चल जाने के बावजूद कि इस आंदोलन के पीछे संघ का हाथ है.
लेकिन भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार को आंदोलनों से दिक्कत है.
इस दिक्कत को समझना कठिन नहीं है बशर्ते आप सही सिरा पकड़ लें.
सही सिरा भाजपा को समझने से नहीं मिलेगा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का डर समझने से भी नहीं मिलेगा और न केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह का चाल चरित्र और चेहरा समझने से मिलेगा.
यह मिलेगा आरएसएस को, आंदोलनों और संघर्षों को लेकर उसकी सोच को समझने से.
चलिए समझने की कोशिश करते हैं.
दिल्ली इन दिनों आंदोलनरत है. कुछ दिनों की चुप्पी को छोड़ दें तो गत 20 जुलाई से संघर्ष देखने को मिल रहा है.
पहले पेपर लीक के ख़िलाफ़ शिक्षा मंत्री का इस्तीफ़ा मांगने का आंदोलन था.
इस्तीफ़ा हो गया.
अब वोट चोरी के ख़िलाफ़ मुख्य चुनाव आयुक्त से इस्तीफ़ा मांगने के लिए आंदोलन चल रहे हैं.
दो अक्टूबर से तो लगातार सड़कों पर आंदोलन चल रहा है.
कभी नेता प्रतिपक्ष के नेतृत्व में विपक्ष के 300 सांसद चुनाव आयुक्तों से मिलने निकल पड़े तो अगले दिन विपक्ष के नेता फिर सड़कों पर आ गए.
10 अक्टूबर को घोषणा के मुताबिक सीजेपी का धरना प्रदर्शन होना था. इसमें दूसरे छात्र संगठन जैसे आइसा और एसएफ़आई भी शामिल थे.
** आंदोलनों पर प्रतिक्रिया **
20 जुलाई को दिल्ली की पुलिस और दिल्ली पुलिस के संरक्षण में कुछ अज्ञात अनाम लोगों ने छात्रों को दौड़ा दौड़ाकर पीटा, लड़कियों से अभद्रता हुई, अश्रुगैस छोड़ा गया, पैलेटगन तक चलाई गई. कुल मिलाकर आंदोलन को सुरक्षाबलों के हाथों कुचलने की कोशिश हुई.
जितनी कोशिश हुई, उसकी प्रतिक्रिया उससे भी बड़ी हो गई. आख़िर सरकार को झुकना पड़ा. शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफ़ा देना पड़ा.
फिर इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कलई खोल दी. इस रिपोर्ट से उनके ख़िलाफ़ कांग्रेस नेता राहुल गांधी के वोट चारी के आरोपों की पुष्टि हो गई.
इसके बाद ज्ञानेश कुमार का इस्तीफ़ा मांगने के लिए आंदोलन शुरु हो गए.
पूरी दिल्ली छावनी में बदल दी गई. कहते हैं कि एक लाख जवान दिल्ली में तैनात कर दिए गए. फिर भी युवा रुके नहीं.
57 मेट्रो बंद, 200 ट्रेनों को दिल्ली आने से रोक दिया गया. सेंट्रल दिल्ली को बैरीकेड्स से सील कर दिया गया. फिर भी सात हज़ार हिरासत में लिए गए.
12 अक्टूबर को एक बार फिर कांग्रेस सड़कों पर उतरने वाली है.
चाहे वो सांसद हों, विपक्ष के नेता हों या फिर सीजेपी और छात्र संगठन के सदस्य. भाजपा सरकार को कुछ भी मंज़ूर नहीं.
‘आंदोलनजीवी’ जैसे शब्दों से आंदोलनकारियों पर तंज़ करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके गृहमंत्री अमित शाह, दोनों ही, ऐसा लगता है कि दहशत में हैं.
तो सवाल यह है कि ये लोग इतना डरते क्यों हैं?
इसकी जड़ें तलाशने के लिए या इसका सही सिरा पड़कने के लिए आपको चलना पड़ेगा आज़ादी के आंदोलन तक.
** गुरु गोलवलकर से माफ़ीवीर सावरकर तक **
आज़ादी के मुख्य रूप से तीन बड़े आंदोलन हुए.
1. असहयोग आंदोलन (1920-22)
2. सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930-34)
3. भारत छोड़ो आंदोलन (1942)
अब इन तीनों आंदोलनों में आरएसएस की भूमिका पर बात करते हैं.
असहयोग आंदोलन के समय तो आरएसएस का गठन नहीं हुआ था. तो उस समय केशव बलिराम हेडगेवार कांग्रेस में थे. उन्होंने इस आंदोलन में भाग लिया पर हिंदू संगठनों से जुड़ और प्रमुख लोग दूर ही रहे.
बाद में गोलवलकर ने असहयोग आंदोलन में युवाओं की भूमिका पर बात करते हुए कहा कि इस तरह से आंदोलनों से ‘अनुशासनहीनता आती है और युवाओं के मन में क़ानून के प्रति आस्था कम होती है.’ ज़ाहिर है वे युवाओं के ब्रिटिश सरकार और क़ानून के ख़िलाफ़ हो जाने का ज़िक्र कर रहे थे.
सविनय अवज्ञा आंदोलन के समय लोग तत्कालीन संघ प्रमुख हेडगेवार के पास गए तो उन्होंने साफ़ कह दिया कि संघ एक संगठन के रूप में इस आंदोलन में हिस्सा नहीं लेगा.
कुछ दबाव बढ़ा तो संघ से इस्तीफ़ा देकर हेडगेवार व्यक्तिगत तौर पर जेल तो गए. लेकिन बाहर आकर कहा कि वे जेल में बंद युवाओं को संघ के बारे में समझाने गए थे.
भारत छोड़ो आंदोलन में भी संघ का यही रवैया रहा.
तब के सरसंघचालक एम.एस. गोलवलकर के नेतृत्व में आरएसएस ने संगठनात्मक रूप से इस आंदोलन में भाग न लेने का फैसला किया.
‘श्री गुरुजी समग्र दर्शन’ के अनुसार गोलवलकर ने ख़ुद लिखा है, “1942 में भी अनेकों के मन में तीव्र आंदोलन था लेकिन उस समय भी संघ का नित्य कार्य चलता रहा. संघ ने प्रत्यक्ष रूप से कुछ न करने का संकल्प लिया.”
स्वयंसेवकों को कांग्रेस के आंदोलनों से दूर रहने की हिदायत दी गई थी.
गोलवलकर ने माना कि बहुत से लोग संघ को ‘निष्क्रिय लोगों का संगठन’ मानने लगे थे और इनमें संघ के सदस्य भी थे.
लेकिन संघ ने अपने विचार नहीं बदले. वह आज़ादी की लड़ाई से दूर रहा.
तभी तो ब्रिटिश खुफिया और बॉम्बे होम डिपार्टमेंट की रिपोर्टें स्पष्ट कहती हैं कि आरएसएस ने “कानून के दायरे में रहकर काम किया और अगस्त 1942 की अशांति में भाग नहीं लिया.” 
सार संक्षेप में कहें तो आरएसएस का मूल चरित्र आंदोलनों से दूर रहने का है. उसके डीएनए में कायरता है. डर है. भय है.
जिसे वे वीर कहते हैं उस सावरकर के माफ़ीनामे और आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी को लिखे तत्कालीन सरसंघचालक बालासाहेब देवरस पत्र गवाह हैं कि इनको जेल जाने से भयानक किस्म का डर लगता है.
इसलिए जब ‘आंदोलनजीवी’ शब्द आते हैं तो आपको समझना चाहिए कि यह आरएसएस के पूर्व प्रचारक के ही उद्गार हैं, देश के प्रधानमंत्री के नहीं.
अमित शाह यदि दिल्ली में आंदोलनों को कुचलना चाहते हैं तो इस फ़ैसले के पीछे केंद्रीय गृहमंत्री कम, आरएसएस की शाखा से निकला भाजपा कार्यकर्ता ज़्यादा है.
वे आंदोलनों और संघर्षों से डरते हैं.
और मानते हैं कि आंदोलन लोगों की सोच को भ्रष्ट कर देते हैं. उनके गुरु गोलवलकर ऐसा ही बता गए हैं.
तो आप जब भी सरकार के चेहरे पर डर पढ़ें तो समझ लीजिएगा कि इसका सिरा आरएसएस से जुड़ा है.
वे डरे हुए लोग हैं. कायर हैं.
आप संविधान की लाख दुहाई देते रहिए, वे तो संविधान को मानते ही नहीं तो सम्मान काहे का?
न आरएसएस लोकतंत्र के पक्ष में रहा है. तो भाड़ में जाए लोकतंत्र, आरएसएस की बला से.
देश हमारा है, संविधान हमारा है, हम लोकतंत्र चाहते थे. तो हमें ही इसे बचाना होगा.
और पहले आरएसएस के हाथों से बचाना है. 

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